
Rama Devi Sahu
139 days ago
अरे, यह क्या हो रहा है? एक देवी को मंदिर के अंदर उल्टा लटका कर बांध दिया गया है। वह भी कोई साधारण देवी नहीं एकादशी माता। लेकिन ऐसा कौन कर सकता है और क्यों? क्या सच में भगवान ने ही उन्हें दंड दिया था या इसके पीछे कोई गहरी लीला छिपी है। आज की यह कथा आपको अंदर तक हिला देगी। आपने सुना होगा एकादशी के दिन अन्न खाना पाप माना जाता है। लोग पानी तक सीमित रहते हैं। चावल का नाम सुनकर भी डरते हैं। लेकिन भारत में एक जगह ऐसी भी है जहां एकादशी के दिन सबसे ज्यादा भात बनता है। वो जगह है पूरी धाम जहां हजारों लोग बैठकर हंसते हुए गरमागरम महाप्रसाद खाते हैं। अब सोचो यह नियम का उल्लंघन है या कोई दिव्य रहस्य। कहानी शुरू होती है सृष्टि के प्रारंभिक समय से। जब भगवान विष्णु योग निद्रा में थे और तभी उनके शरीर से एक दिव्य प्रकाश निकला। वो प्रकाश इतना तेज था कि देवता भी अपनी आंखें झुका लें। उसी प्रकाश से जन्म हुआ एकादशी देवी का। उनका रूप अत्यंत तेजस्वी था। आंखों में तपस्या और चेहरे पर अद्भुत शांति। भगवान ने उन्हें देखा और मुस्कुराए। देवी तुम्हारा जन्म एक विशेष कार्य के लिए हुआ है। तुम संसार के पापों को समाप्त करोगी। हर महीने दो दिन तुम्हारा प्रभाव रहेगा। जो भी उस दिन अन्न खाएगा उसके सारे पाप उसी अन्न में समा जाएंगे और जो व्रत करेगा उसे मेरा धाम प्राप्त होगा। बस यहीं से शुरू हुआ एक नियम। धीरे-धीरे तीनों लोकों में यह बात फैल गई। स्वर्ग, पृथ्वी, पाताल हर जगह एकादशी का प्रभाव। राजा हो या भिखारी सब उस दिन अन्न से दूर रहने लगे। समय बीतता गया और जैसे-जैसे एकादशी देवी की महिमा फैलती गई, वैसे-वैसे उनके भीतर एक सूक्ष्म अहंकार जन्म लेने लगा। हर दिशा में उनका ही प्रभाव था। एकादशी का दिन आते ही पूरी सृष्टि मानो थम जाती। चूल्हे बुझ जाते,रसोई शांत हो जाती और लोग श्रद्धा से व्रत रखते। धीरे-धीरे उनके मन में एक विचार आया। क्या सच में पूरी सृष्टि मेरे अधीन है? क्या कोई ऐसा स्थान भी है जहां मेरा प्रभाव ना हो? यही सोचकर उन्होंने स्वयं ही लोकर का भ्रमण करने का निश्चय किया और हर जगह जाकर देखा उनका ही नियम चल रहा है। अब उनका आत्मविश्वास अहंकार में बदल चुका था। तभी उनकी दृष्टि पड़ी नीलांचल धाम जगन्नाथ पुरी पर। उन्होंने सोचा अब यहीं जाकर अपने प्रभाव की अंतिम परीक्षा लूंगी। लेकिन उन्हें नहीं पता था यहीं उनकी सारी धारणाएं टूटने वाली हैं। जब एकादशी देवी पूरी धाम पहुंची और मंदिर के अंदर प्रवेश किया तो जो उन्होंने देखा वह उनके लिए असहनीय था। जहां उन्हें शांति की उम्मीद थी वहां उत्सव चल रहा था। भक्तों की भीड़, हंसी, आनंद, आनंद बाजार में बैठे लोग गरमागरम भात, दाल प्रेम से खा रहे थे। चारों ओर जय जगन्नाथ की गूंज थी। यह दृश्य उनके अस्तित्व को चुनौती देने जैसा था। उनके भीतर क्रोध भड़क उठा और बिना एक पल गवाए वो सीधे गर्भगृह की ओर बढ़ी। जहां भगवान जगन्नाथ अपने भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा के साथ विराजमान थे। वातावरण शांत था, दिव्य था। मानो सब पहले से जानता हो क्या होने वाला है। देवी ने प्रवेश करते ही कहा प्रभु यह क्या हो रहा है? आपने ही मुझे वरदान दिया था कि एकादशी के दिन अन्न में पाप का वास होगा। फिर आज आपके ही धाम में यह नियम क्यों तोड़ा जा रहा है? उनके स्वर में आक्रोश था और अहंकार साफ दिखाई दे रहा था। भगवान जगन्नाथ ने शांत दृष्टि से उनकी ओर देखा और बोले देवी जिसे तुम अन्न समझ रही हो वो साधारण अन्न नहीं है। वह मेरा महाप्रसाद है। इसमें ना पाप है ना कोई दोष। यह मेरी कृपा का स्वरूप है। जहां मेरा प्रसाद होता है, वहां सभी नियम समाप्त हो जाते हैं। उनके शब्दों में केवल प्रेम था, लेकिन अहंकार में डूबी देवी इस सत्य को स्वीकार नहीं कर पाई। उन्होंने कहा नियम तो नियम होता है प्रभु और मैं इस अन्याय को नहीं होने दूंगी। इतना कहकर वह भक्तों को रोकने के लिए आगे बढ़ी और जैसे ही उन्होंने महाप्रसाद की ओर हाथ बढ़ाया उसी क्षण पूरा वातावरण बदल गया। हवा भारी हो गई। समय जैसे थम गया। तभी एक गूंजती हुई आवाज आई। रुको देवी भगवान की आंखों में दिव्य तेज प्रकट हुआ। तुमने मेरे महाप्रसाद को पाप कहने का दुस्साहस किया है। यह केवल अन्न नहीं यह स्वयं ब्रह्म का स्वरूप है। इसके सामने तुम्हारे नियम भी छोटे हैं। लेकिन देवी अभी भी नहीं मानी। उन्होंने कहा मैं हर उस व्यक्ति का पुण्य नष्ट कर दूंगी जो आज अन्न खाएगा।

Comments (2)

Rama Devi Sahu
Apr 13, 2026
🙏‼️ Jai Jagannath ‼️🙏 Shubha Sandhya Vandan Jii 🙏🌹🌹

Umesh Sharma 🌹Radhe Radhe🌹
Apr 13, 2026
jai jagnnath peabhu🌹🌹
