
प्रशांत कुमार मिश्रा
7 hours ago
पितृपक्ष में भगवान पितरों को धरती पर जाने का आदेश क्यों देते हैं? 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️ यह प्रश्न केवल एक तिथि का नहीं, यह प्रश्न सृष्टि के सबसे बड़े रहस्य - मृत्यु के बाद जीवन का रहस्य है। पितृपक्ष क्या है, 15 दिन के लिए हमारे पितर धरती पर क्यों आते हैं, भगवान उन्हें आदेश क्यों देते हैं, इसका उत्तर आपको एक नहीं, पांच पुराणों और तीन शाप-कथाओं को जोड़कर समझना पड़ेगा। पहला अध्याय 👉🏻 पितृलोक क्या है, कहां है? 〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️ हम सोचते हैं, स्वर्ग और नर्क बस दो ही लोक हैं। पर गरुड़ पुराण कहता है, सृष्टि में 14 लोक हैं, 7 ऊपर, 7 नीचे। ऊपर के लोकों में - भू, भुवः, स्वः, महः, जनः, तपः, सत्यम्। भू लोक यह धरती है, जहां हम रहते हैं। भुवः लोक अंतरिक्ष है, जहां भूत-प्रेत, पिशाच रहते हैं। स्वः लोक इंद्र का स्वर्ग है, जहां देवता रहते हैं। पर पितरों का लोक इनसे अलग है। पितृलोक, चंद्रमा के ऊपर, और सूर्य से नीचे, एक विशेष स्थान पर है, जिसे *पितृलोक या यमलोक का एक भाग* कहा जाता है। इस लोक के अधिपति हैं *अर्यमा*, जो 12 आदित्यों में से एक हैं, और पितरों के राजा हैं, और इनके न्यायाधीश हैं *यमराज*। हर जीव जब मरता है, तो उसकी तीन गतियां होती हैं। यदि उसने बहुत पाप किए हैं, तो वह नरक में जाता है। यदि बहुत पुण्य किए हैं, तो स्वर्ग में जाता है। पर 90% सामान्य मनुष्य, जिनमें पाप और पुण्य दोनों हैं, वे पितृलोक में जाते हैं। वहां वे अपने परिवार के लोगों की प्रतीक्षा करते हैं, कि कब उनका पुत्र, पौत्र, उनके नाम से पिंडदान, तर्पण, श्राद्ध करेगा, ताकि उन्हें आगे की गति मिले, मुक्ति मिले। गरुड़ पुराण कहता है, पितर, वायु रूप में होते हैं, उनका शरीर सूक्ष्म होता है, उन्हें भूख लगती है, प्यास लगती है, पर वे अन्न नहीं खा सकते, वे केवल गंध और भाव से तृप्त होते हैं। जब उनका पुत्र उनके नाम से जल देता है, काले तिल के साथ, *"इदं पितृभ्यः नमः"* कहकर, तो वह जल, मंत्र के द्वारा, अमृत बनकर, सीधा पितृलोक में उनके पास पहुंच जाता है। और जब पिंडदान होता है, तो वह चावल का पिंड, उनके लिए दिव्य भोजन बन जाता है। अब प्रश्न उठता है, तो पितर पितृलोक में ही तृप्त क्यों नहीं हो जाते, उन्हें धरती पर आने की क्या आवश्यकता है? दूसरा अध्याय 👉🏻 तीन ऋण का सिद्धांत 〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️ सनातन धर्म कहता है, हर मनुष्य जन्म लेते ही, तीन ऋणों के साथ पैदा होता है - *देव ऋण, ऋषि ऋण, और पितृ ऋण।* देव ऋण 👉🏻 हम देवताओं से सूर्य का प्रकाश, चंद्रमा की शीतलता, इंद्र का जल, वायु की सांस लेते हैं, इसलिए यज्ञ-पूजन करके हमें देव ऋण चुकाना होता है। ऋषि ऋण 👉🏻 हम वेद, शास्त्र, ज्ञान, जो ऋषियों ने हजारों वर्ष तपस्या करके हमें दिया, उससे हम शिक्षित होते हैं, इसलिए स्वाध्याय करके, ज्ञान बांटकर, हमें ऋषि ऋण चुकाना होता है। और तीसरा, सबसे बड़ा ऋण 👉🏻 पितृ ऋण। यह शरीर हमें हमारे माता-पिता ने दिया, यह नाम हमें हमारे दादा-परदादा ने दिया, यह जमीन-जायदाद, संस्कार, गोत्र, सब हमें पितरों से मिला। इसलिए संतान उत्पन्न करके, उनका श्राद्ध-तर्पण करके, हमें पितृ ऋण चुकाना होता है। यदि कोई मनुष्य पितृ ऋण नहीं चुकाता, तो उसके पितर पितृलोक में अतृप्त रहते हैं, भूखे-प्यासे भटकते हैं, और वे दुखी होकर, अपने ही वंश को श्राप दे देते हैं, जिसे *पितृदोष* कहते हैं। पितृदोष से घर में संतान नहीं होती, धन नहीं टिकता, विवाह में बाधा आती है, रोग पीछा नहीं छोड़ता। इसलिए भगवान ने एक व्यवस्था बनाई। तीसरा अध्याय 👉🏻 भगवान का आदेश, सूर्य के कन्या राशि में आने पर 〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️ आपने देखा होगा, पितृपक्ष हमेशा तब आता है, जब सूर्य, कन्या राशि में प्रवेश करता है। इसे *कनागत* भी कहते हैं। ज्योतिष कहता है, कन्या राशि, पितरों की राशि है। पद्म पुराण और ब्रह्म वैवर्त पुराण में कथा आती है, सृष्टि के आरंभ में, ब्रह्मा जी ने जब पितरों की रचना की, तो पितर बहुत भूखे थे, उन्होंने ब्रह्मा जी से कहा, हे सृष्टिकर्ता, हमारे लिए भोजन की व्यवस्था कीजिए। ब्रह्मा जी ने कहा, तुम्हारे वंशज जो तुम्हें श्राद्ध में भोजन देंगे, वही तुम्हारा भोजन होगा। पर पितर पितृलोक से देख नहीं सकते कि उनका वंशज क्या कर रहा है, वे सूक्ष्म लोक में हैं। इसलिए भगवान विष्णु ने, यमराज को आदेश दिया, और यमराज ने नियम बनाया - "आश्विन मास के कृष्ण पक्ष के 15 दिन, जब सूर्य कन्या राशि में होगा, तब मैं पितृलोक के द्वार खोल दूंगा, और सभी पितरों को मैं 15 दिन के लिए, पृथ्वी पर, अपने-अपने वंशजों के घर जाने की अनुमति दूंगा, ताकि वे स्वयं देख सकें, कि उनका वंशज उन्हें याद कर रहा

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