
Rama Devi Sahu
103 days ago
कुम्भ - व्यक्ति , वस्तु एवं विचार (अंक -१) कुंभ से आविर्भूत व्यक्ति गोस्वामी तुलसीदास जी रामचरितमानस के बालकांड में लिखते हैं - एक बार त्रेता जुग माहीं। संभु गए कुंभज रिषि पाहीं।। अर्थात् एक बार त्रेता युग में ऋषि कुंभज (अगस्त्य) के यहां शिवजी गए। जासु कथा कुंभज रिषि गाई। भगति जासु मैं मुनिहि सुनाई।। सोई मम इष्टदेव रघुबीरा। अर्थ - जिनकी कथा का कुंभज (अगस्त्य) ऋषि ने गान किया और जिनकी भक्ति मैंने मुनि को सुनाई। वही मेरे इष्टदेव श्री रघुवीर जी हैं। ऋषि अगस्त्य को पुराणों में " कुंभज " कहा गया है। पंकज यानी पंक (कीचड़) से उत्पन्न अर्थात् कमल। इसी प्रकार कुंभज यानी कुंभ (घट) से उत्पन्न अर्थात् अगस्त्य। तुलसीदास जी इसलिए अगस्त्य के लिए " घटयोनि " का भी प्रयोग करते हैं - बालमीक नारद घटजोनी। निज निज मुखनि कही निज होनी।। अर्थ - वाल्मीकि जी , नारद जी और अगस्त्य जी ने अपने-अपने मुखों से अपनी होनी (जीवन का वृतांत) कही है। पौराणिक कथाओं के अनुसार ऋषि अगस्त्य का आविर्भाव कुंभ (घट) से हुआ था। वर्तमान में जिस प्रकार टेस्ट-ट्यूब से बेबी का जन्म हुआ , उसी प्रकार आदिकाल में कुंभ से मानव को उत्पन्न करने का प्रयोग हुआ था। हम सभी जानते हैं कि मानव का जन्म गर्भ से होता है। लेकिन जीव वैज्ञानिकों ने टेस्ट ट्यूब में मानव गर्भ के अनुकूल वातावरण का निर्माण किया था। प्राचीन विज्ञान वर्तमान विज्ञान से अति उन्नत था। हमारे ऋषि वैज्ञानिकों ने कुंभ को गर्भ का रूप देकर उससे मानव उत्पन्न करने में सफलता पाई थी। कुंभज ऋषि इसके प्रमाण हैं। इस घटना से प्रभावित एवं प्रेरित होकर वर्तमान विश्व के जीव-वैज्ञानिकों ने " टेस्ट ट्यूब बेबी " का निर्माण किया था। कुंभ में अंतर्निहित वस्तु हम सभी जानते हैं कि देव - दैत्यों द्वारा समुद्रमंथन के फलस्वरूप 14 रत्नों की प्राप्ति हुई थी। इनमें से तीन वस्तुएं ऐसी थीं , जो कुंभ (कलश) के माध्यम से प्रकट हुई थीं। ये तीन द्रव्य थे - विष (जहर) , वारुणी (सुरा) और अमृत। विष को शंकर जी ने अपने कंठ में धारण कर नीलकंठ के नाम से जगत् विख्यात हुए। सुरा देवी (वारुणी) आकाश मार्ग से देवताओं के लोक में चली गई। अमृत को लेकर ही देव-दानवों के बीच देवासुर संग्राम हुआ था। मनुष्य के शरीररूपी घट (कुंभ) में ये तीनों द्रव्य रहते हैं। केवल उनका स्वरूप बदल जाता है। अहंकार, ईर्ष्या, क्रोधादि विष के समान हैं। अच्छे मित्र की पहचान बताती हुई चाणक्य नीति कहती है - परोक्षे कार्यहन्तारं प्रत्यक्षे प्रियावादिनम्। वर्जयेत्तादृशं मित्रं विषकुंभ पयोमुखम्।। इसका अभिप्राय यह है कि जो मुख पर प्रशंसा करे , लेकिन पीठ पीछे बुराई करे - ऐसे व्यक्ति " पयोमुख विषकुंभ " की तरह होते हैं , जिसके अंदर तो विष रहता है , परन्तु मुख पर दूध लगा होता है। लोभ , मोहादि सुरा के समतुल्य होते हैं। जिस परम तत्त्व के कारण मनुष्य में चेतना रहती है , वह अमृत अर्थात् आत्मा है। इसी के कारण मनुष्य को जीवात्मा कहा जाता है। ।। अमृत कुंभ की जय ।।

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