
Sanjay Varman
207 days ago
दीयों की रोशनी में लौटा राजा चौदह वर्षों के लंबे वनवास के बाद वह शुभ दिन आया, जब श्रीराम अयोध्या लौटने वाले थे। नगर में उत्साह तो था, पर लोगों के मन में एक हल्की-सी शंका भी— “क्या राम वही रहेंगे, जो गए थे?” भरत ने सबसे पहले नगर के द्वार सजवाए। उन्होंने आज्ञा दी— “अयोध्या का हर घर दीप जलाए, जैसे अंधकार स्वयं भाग रहा हो।” उधर, जब राम, लक्ष्मण और सीता रथ से नगर में प्रवेश कर रहे थे, तो एक विचित्र दृश्य हुआ। एक वृद्ध माली, जो वर्षों से राजउद्यान की देखभाल कर रहा था, दौड़ता हुआ आया और बोला— “प्रभु! जब आप वन में थे, तब भी ये फूल आपकी राह देखते थे। आज पहली बार इनकी खुशबू लौटी है।” राम मुस्कुराए और बोले— “राजा वही होता है, जिसे उसकी प्रजा याद रखे।” तभी एक बालक आगे बढ़ा और राम से पूछा— “आप राजा बनेंगे, तो क्या फिर जंगल जाएंगे?” राम ने बच्चे के सिर पर हाथ रखकर कहा— “अब अयोध्या ही मेरा वन है, और तुम सब मेरे साथी।” यह सुनकर अयोध्या की आँखें भर आईं। उस रात दीयों की रोशनी इतनी तेज़ थी कि कहा जाता है— अंधकार ने भी अयोध्या छोड़ दी। और तभी से यह दिन दीपावली कहलाया— केवल राम के लौटने की नहीं, धर्म, विश्वास और करुणा की विजय की स्मृति

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