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शारदीय नवरात्रि विशेष 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️ शारदीय नवरात्रि घट (कलश) स्थापना मुहूर्त एवं पूजाविधि 〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️ प्रतिवर्ष की भांति इसवर्ष भी हिंदुओ के प्रमुख त्योहारो में से एक शारदीय नवरात्रि आश्विन शुक्ल पक्ष प्रतिपदा से नवमी तक मनाया जाएगा। इस नवरात्रि मां जगदंबा हाथी पर आएंगी और सिंह पर बैठकर जाएंगी । रविवार के दिन हस्त नक्षत्र ऐन्द्र व ब्रह्म योग कन्या राशि के चन्द्र व कन्या के ही सूर्य में यदि देवी आराधना का पर्व शुरू हो, तो यह देवीकृपा व इष्ट साधना के लिए विशेष रूप से शुभ माना जाता है। देवी भागवत में नवरात्रि के प्रारंभ व समापन के वार अनुसार माताजी के आगमन प्रस्थान के वाहन इस प्रकार बताए गए हैं। आगमन वाहन 〰️〰️〰️〰️〰️ "शशि सूर्य गजरुढा शनिभौमै तुरंगमे। गुरौशुक्रेच दोलायां बुधे नौकाप्रकीर्तिता॥" रविवार व सोमवार को हाथी, शनिवार व मंगलवार को घोड़ा, गुरुवार व शुक्रवार को पालकी, बुधवार को नौका आगमन। इस साल शारदीय नवरात्रि सोमवार से प्रारंभ हो रही हैं इसके अनुसार देवी मां गज (हाथी) पर विराजकर कैलाश से धरती पर आ रही हैं। प्रस्थान वाहन 〰️〰️〰️〰️रविवार व सोमवार भैंसा, शनिवार और मंगलवार को सिंह, बुधवार व शुक्रवार को गज हाथी, गुरुवार को नर वाहन पर प्रस्थान अतः मां का आगमन हाथी पर होगा जो समृद्धि व खुशहाली का प्रतीक है। माता की विदाई भी इस वर्ष गज (हाथी) पर होगी। देवी भागवत के अनुसार जब मां का आगमन व विदाई हाथी पर होती है देश में खुशहाली का वातावरण निर्मित होता है व पर्याप्त वर्षा से जनता प्रसन्न होती है। नवरात्रि में घटस्थापना, ज्वार रोपण नवदुर्गाओं की क्रमशः पूजन, अर्चन, दुर्गा सप्तशती के सात सौ महामंत्रों से हवन, कन्या पूजन व अपनी अपनी कुल परम्परा के अनुसार कुल देवी पूजन व उपवास का विशेष महत्व है। साधक भाई बहन जो ब्राह्मण द्वारा पूजन करवाने में असमर्थ है एवं जो सामर्थ्यवान होने पर भी समयाभाव के कारण पूजा नही कर पाते उनके लिये पंचोपचार विधि द्वारा सम्पूर्ण पूजन विधि बताई जा रही है आशा है आप सभी साधक इसका लाभ उठाकर माता के कृपा पात्र बनेंगे। घट स्थापना एवं माँ दुर्गा पूजन शुभ मुहूर्त 〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️ नवरात्रि में घट स्थापना का बहुत महत्त्व होता है। शुभ मुहूर्त में कलश स्थापित किया जाता है। घट स्थापना प्रतिपदा तिथि में कर लेनी चाहिए। इसे कलश स्थापना भी कहते है। कलश को सुख समृद्धि , ऐश्वर्य देने वाला तथा मंगलकारी माना जाता है। कलश के मुख में भगवान विष्णु , गले में रूद्र , मूल में ब्रह्मा तथा मध्य में देवी शक्ति का निवास माना जाता है। नवरात्री के समय ब्रह्माण्ड में उपस्थित शक्तियों का घट में आह्वान करके उसे कार्यरत किया जाता है। इससे घर की सभी विपदा दायक तरंगें नष्ट हो जाती है तथा घर में सुख शांति तथा समृद्धि बनी रहती है। आश्विन शुक्ल प्रतिपदा, 11 अक्टूबर (रविवार) को शारदीय नवरात्र का आरम्भ हो रहा है। देवीपुराण में द्विस्वभाव लग्न युक्त प्रातः काल में देवी का आह्वान एवं घटस्थापना पूजन करने का विधान है। इस दिन चित्रा नक्षत्र रात्रि 10:32 तक एवं वैधृति योग रात्रि 09:05 तक है। प्रतिप्रदा के दिन चित्रा नक्षत्र व वैधृति योग या दोनों में से कोई एक भी सम्पूर्ण दिन व्याप्त रहे तो अभिजित् मुहूर्त में घटस्थापना करनी चहिए। यथाः👉🏻 सम्पूर्ण प्रतिपद्देव चित्रायुक्ता यदा भवेत्। वैधृत्या वापि युक्ता स्यात्तदा मध्यदिने रवौ। अभिजित्तु मुहूर्त यत्तन्त्र स्थापनमिष्यते।। निणर्यसिन्धु चित्रा नक्षत्र व वैधृति योग को घटस्थापना में त्याज्य बताया गया है, किन्तु इन दोनों के आदि के दो चरणों को त्याग कर घटस्थापना की अनुमति प्रदान की जाति है। यथाः👉🏻 तदुक्तं तत्रैव कात्यायनेन प्रतिपाद्याश्विने मासि भवो वैधृति चित्रयोः। आद्यः पादौ परित्ज्य प्रारभेनवरात्रक्रमिति ।। चित्रा नक्षत्र के दो चरण प्रातः 10:03 पर समाप्त होंगे एवं वैधृति के दो चरण प्रातः 09:33 पर समा होंगे। अतः अति आवश्यकता में घटस्थापना हेतु लाभ-अमृत का चौघड़िया प्रातः 10:04 से दोपहर 12:15 तक रहेगा, अभिजित् प्रातः 11:49 से दोपहर 12:37 तक रहेगा। द्विस्वभाव (धनु) लग्न प्रातः 11:32 से दोपहर 01:36 तक रहेगा। नवरात्रि की तिथियाँ 〰️〰️〰️〰️〰️〰️ पहला नवरात्र 👉🏻 प्रथमा तिथि 11 अक्टूबर 2026, रविवार, वैधृति योग, माँ शैलपुत्री की उपासना। दूसरा नवरात्र 👉🏻 द्वितीया तिथि, 12 अक्टूबर, सोमवार, किस्तुघ्न योग, माँ ब्रह्मचारिणी की उपासना। तीसरा नवरात्र 👉🏻 तृतीया तिथि, 13 अक्टूबर, मंगलवार, प्रीती योग, माँ चंद्रघंटा की उपासना। चौथा नवरात्र 👉🏻 चतुर्थी तिथि, 14 अक्टूबर, बुधवार, आयुष्मान

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