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Rama Devi Sahu

44 days ago

🪷श्री जगन्नाथ जी की अद्भुत महिमा🪷 भगवान श्री जगन्नाथ को भगवान श्रीकृष्ण का विश्वरूप माना जाता है। "जगन्नाथ" का अर्थ है समस्त जगत के स्वामी। पुरी धाम भारत के चार प्रमुख धामों में से एक है और मोक्षदायक तीर्थ के रूप में प्रसिद्ध है। भगवान जगन्नाथ अपने बड़े भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा के साथ भक्तों को दर्शन देते हैं। उनकी विशाल गोल आँखें इस बात का प्रतीक हैं कि वे बिना किसी भेदभाव के समस्त संसार पर अपनी कृपा-दृष्टि बनाए रखते हैं। रथ यात्रा क्यों होती है? आषाढ़ शुक्ल द्वितीया को भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा भव्य रथों पर आरूढ़ होकर श्री गुंडिचा मंदिर की यात्रा करते हैं। इसे भगवान के अपने भक्तों के बीच आने का उत्सव माना जाता है। मान्यता है कि यह यात्रा भगवान के मौसी घर जाने का प्रतीक है, वहीं आध्यात्मिक दृष्टि से यह संदेश देती है कि भगवान स्वयं अपने भक्तों तक पहुँचते हैं। द्वारका से पुरी आने की कथा मान्यता है कि श्रीकृष्ण के देहावसान के पश्चात उनका दिव्य ब्रह्म तत्व समुद्र के माध्यम से दिव्य दारु (पवित्र काष्ठ) के रूप में पुरी तट पर पहुँचा। राजा इन्द्रद्युम्न को स्वप्न में भगवान ने उसी दारु से अपनी प्रतिमा स्थापित करने का आदेश दिया। भगवान विश्वकर्मा ने मूर्तियाँ बनानी प्रारम्भ कीं, परन्तु समय से पहले द्वार खुल जाने के कारण प्रतिमाएँ अधूरी रह गईं। भगवान ने उसी दिव्य स्वरूप में विराजमान रहने की इच्छा व्यक्त की और तभी से जगन्नाथ, बलभद्र तथा सुभद्रा की अद्वितीय काष्ठमूर्तियाँ पूजी जाती हैं। जगन्नाथ मंदिर की विशेषताएँ मंदिर का नीलचक्र अष्टधातु से निर्मित है और अत्यंत पवित्र माना जाता है। प्रतिदिन मंदिर का ध्वज बदला जाता है। यहाँ का महाप्रसाद "अन्नब्रह्म" कहलाता है और सभी जाति-वर्ग के लोग समान भाव से ग्रहण करते हैं। कुछ वर्षों के अंतराल पर नवकलेवर महोत्सव में भगवान की नई काष्ठमूर्तियाँ बनाई जाती हैं, जो विश्व में अपनी तरह की अद्वितीय परंपरा है। श्री जगन्नाथ अष्टकम् कदाचित् कालिन्दी तट-विपिन-संगीत-करवो मुदाभीरी-नारी-वदन-कमलास्वाद-मधुपः। रमा-शम्भु-ब्रह्मामर-पति-गणेशार्चित-पदो जगन्नाथः स्वामी नयन-पथ-गामी भवतु मे॥१॥ भुजे सव्ये वेणुं शिरसि शिखिपिच्छं कटितटे दुकूलं नेत्रान्ते सहचर-कटाक्षं विदधते। सदा श्रीमद् वृन्दावन-वसति-लीला-परिचयो जगन्नाथः स्वामी नयन-पथ-गामी भवतु मे॥२॥ महाम्भोधेस्तीरे कनक-रुचिरे नील-शिखरे वसन् प्रासादान्तः सहज-बलभद्रेण बलिना। सुभद्रा-मध्यस्थः सकल-सुर-सेवावसरदो जगन्नाथः स्वामी नयन-पथ-गामी भवतु मे॥३॥ पोस्ट पसंद आए तो लाइक करें • शेयर करें • कमेंट में लिखें – "जय जगन्नाथ"

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