
Rama Devi Sahu
406 days ago
🙏🌹 Jai Shree Ram 🌹🙏 Dt.20.07.2025 (Sunday) ************************* *🕉️ईश्वर कहाँ मौजूद है?*🕉️ एक बार सर्वशक्तिमान, सृष्टि निर्माता, पिता परमेश्वर, ईश्वर बड़ी दुविधा में पड़ गए कि कोई भी मनुष्य जब भी मुसीबत में पड़ जाता है तो वह भागकर तुरंत ही मेरे पास अपनी परेशानी बताने आ जाता है और कुछ न कुछ माँगने लग जाता है। इस समस्या के निवारण के लिए सभी देवताओं की बैठक बुलाई और बोले- "देवताओं, मैं मनुष्य की रचना करके कष्ट में पड़ गया हूँ। कोई न कोई मनुष्य हर समय बस शिकायत ही शिकायत करता रहता है, जबकि मैं उन्हें उनके कर्मानुसार सब कुछ दे रहा हूँ। फिर भी थोड़े से ही कष्ट में मेरे पास आ जाते हैं। जिससे मेरी तपस्या में व्यवधान होता है । मुझे कृपया ऐसा स्थान बताएँ, जहाँ मनुष्य नाम का प्राणी कदापि न पहुँच सके।" परमेश्वर के विचारों का सम्मान करते हुए, देवताओं ने अपने विचार व्यक्त किए, कुछ ने कहा - " प्रभु, आप हिमालय पर्वत की चोटी पर चले जाएं।" प्रभु बोले- "यह स्थान मनुष्य की पहुँच के भीतर है। उसे वहाँ पहुँचने में अधिक समय नहीं लगेगा।" किसी देवता ने सलाह दी कि, "आप समुद्र में छिप जाएं।" प्रभु ने मना कर दिया और कहा, “मनुष्य गोता लगाना और खोजना सीख जाएगा।" फिर कुछ ने सुझाव दिया- “आप अंतरिक्ष में चले जाएं।" प्रभु ने कहा- “एक दिन मनुष्य वहाँ भी अवश्य पहुँचेगा।" प्रभु निराश होने लगे थे। वे मन ही मन सोचने लगे- “क्या मेरे लिए कोई भी ऐसा गुप्त स्थान नहीं है, जहाँ मैं शांतिपूर्वक रह सकूँ।" अंत में एक देवता बोले- "प्रभु! आप ऐसा करें कि मनुष्य के हृदय में बैठ जाएँ। मनुष्य अनेक स्थान पर आपको ढूंढने में सदा उलझा रहेगा, पर वह यहाँ आपको कदापि न तलाश करेगा।" प्रभु को सुझाव पसंद आ गया। उन्होंने ऐसा ही किया और वह मनुष्य के हृदय में जाकर बैठ गए। उस दिन से मनुष्य अपना दुःख व्यक्त करने के लिए ईश्वर को मन्दिर, ऊपर, नीचे, आकाश, पाताल में ढूँढ रहा है पर वे मिल नहीं रहें हैं। परंतु मनुष्य कभी भी अपने भीतर- "हृदय रूपी मन्दिर" में बैठे हुए अपने ईश्वर अपने प्रभु को महसूस नहीं करता। अरे भाई, ईश्वर तो हमारे भीतर ही स्थित है और हमारी हर गतिविधि को देख रहा है। हमें बस राग-द्वेष, घृणा, वैमनस्य, क्रोध, उपेक्षा, ईर्ष्या, अहंकार, असहिष्णुता, हिंसा आदि बुराइयो को त्यागकर अपने भीतर देखने की ज़रूरत है। ईश्वर हमारे हृदय मे है तो कैसे पायें.... तो तुलसीदासजी कहते है:- *निर्मल मन जन सो मोहिं पावा, मोहिं कपट छल छिद्र न भावा* अर्थात् निर्मल मन से ही ईश्वर की अनुभूति की जा सकती है। ईश्वर को प्रेम चाहिए वह प्रेम का भूखा है । ईश्वर के प्रति यदि व्यक्ति छल कपट अथवा छिद्र रखकर उसे प्राप्त करना चाहता है तो यह कदापि संभव नहीं है। *एक सुंदर सा भजन है।* मोको कहां ढूंढे रे बंदे, मैं तो तेरे पास में । मोको कहां ढूंढे रे बंदे, मैं तो तेरे पास में । ना तीरथ में ना मूरत में, ना एकांत निवास में । ना मंदिर में, ना गुरुद्वारा में, ना कैलाश में । मैं तो तेरे पास में । ना मैं जप में, ना मैं तप में, ना मैं व्रत उपवास में । ना मैं क्रिया क्रम में रहता, ना ही योग संन्यास में । मैं तो तेरे पास में । नहीं प्राण में नहीं पिंड में, ना ब्रह्माण्ड आकाश में । ना मैं त्रिकुटी भवर में, सब स्वांसो के स्वास में । मैं तो तेरे पास में । खोजी होए तुरंत मिल जाऊं, एक पल की ही तलाश में । कहे कबीर सुनो भाई साधो, मैं तो हूँ विश्वास में । मैं तो तेरे पास में । मोको कहां ढूंढे रे बंदे, मैं तो तेरे पास में । 🙏 🙏🌹 Jai Shree Ram 🙏 Jai Siya Ram 🙏🌹
Comments (3)

RAKESH SHARMA OM NAMH SHIVAY 🥀🚩
Jul 20, 2025
NICE POST 👌🙏

RAKESH SHARMA OM NAMH SHIVAY 🥀🚩
Jul 20, 2025
शुभ रविवार ये शुभ दिन शुभफलदाई मंगलकारी रहे ॐ श्री सूर्य देवाय नमो नमः 🙏🚩

Deepak karki
Jul 20, 2025
❤️🔱🔔🙏🙏🌹रविवार सुबह की राम राम जी शुभ रविवार शुभ प्रभात वंदन बहन जी ❤️🔱🔔🙏🌹
