
Rama Devi Sahu
61 days ago
आनंद रामायण के सार कांड में भगवान श्रीराम के राज्याभिषेक के बाद का एक अत्यंत मनोरंजक और मधुर प्रसंग आता है, जिसे 'हनुमान जी का भोजन कौतुक' कहा जाता है। यह कथा हनुमान जी की बाल-सुलभ चपलता, प्रभु श्रीराम के प्रति उनके अनन्य प्रेम और माता सीता के वात्सल्य को दर्शाती है। श्रीराम के अयोध्या का राजा बनने के बाद, एक दिन माता सीता ने स्वयं अपने हाथों से स्वादिष्ट छप्पन भोग तैयार किए। उन्होंने प्रभु श्रीराम, उनके भाइयों (लक्ष्मण, भरत, शत्रुघ्न) और परम भक्त हनुमान जी को भोजन के लिए सादर आमंत्रित किया। सभी के लिए सुंदर आसन लगाए गए। हनुमान जी भी प्रभु के सम्मुख एक आसन पर बैठ गए। माता सीता बड़े ही प्रेम से सभी को भोजन परोसने लगीं। भोजन प्रारंभ होते ही हनुमान जी ने अपनी लीला (कौतुक) शुरू कर दी। उनके भीतर छिपे वानर-स्वभाव और अगाध भूख के कारण वे अत्यंत तीव्र गति से भोजन करने लगे माता सीता हनुमान जी की थाली में जितने भी व्यंजन (पूरी, कचौड़ी, खीर, मिष्ठान) परोसतीं, हनुमान जी पलक झपकते ही उसे चट कर जाते। हनुमान जी को इस तरह बड़ी ही फुर्ती से भोजन करते देख और उनके गालों को बंदरों की तरह फूला हुआ देखकर श्रीराम, लक्ष्मण, भरत और शत्रुघ्न मन ही मन मुस्कुराने लगे। माता सीता रसोई से गरम-गरम पकवान लातीं और हनुमान जी के थाल में डालतीं, लेकिन हनुमान जी का पेट भरने का नाम ही नहीं ले रहा था। रसोई का सारा अन्न धीरे-धीरे समाप्त होने लगा, लेकिन हनुमान जी बार-बार अपनी थाली खाली करके माता की ओर देखने लगते। माता सीता समझ गईं कि हनुमान जी कोई साधारण वानर नहीं हैं, बल्कि वे ग्यारहवें रुद्र (शिवजी) के अवतार हैं। उनकी क्षुधा (भूख) को केवल अन्न से शांत नहीं किया जा सकता, इसे केवल प्रेम और भक्ति से ही तृप्त किया जा सकता है। माता सीता ने तुरंत एक युक्ति निकाली। उन्होंने भोजन के एक ग्रास पर 'श्रीराम' नाम लिखा और उस पर एक तुलसी दल (तुलसी का पत्ता) रखकर उसे अत्यंत प्रेम और आदर के साथ हनुमान जी की थाली में परोस दिया। जैसे ही हनुमान जी ने उस 'राम' नाम अंकित तुलसी दल वाले ग्रास को ग्रहण किया, उनका पेट तुरंत भर गया। उन्होंने एक लंबी और तृप्त डकार ली। उनका रोम-रोम आनंदित हो उठा। हनुमान जी ने भोजन के बाद माता सीता और प्रभु श्रीराम के चरणों में प्रणाम किया। इस कौतुक के माध्यम से हनुमान जी ने यह सिद्ध किया कि वे केवल भौतिक भोजन के भूखे नहीं हैं, बल्कि 'राम नाम' के भूखे हैं। जब तक भोजन में भगवान का नाम और भक्ति (तुलसी) न मिले, तब तक जीव की आत्मा कभी तृप्त नहीं हो सकती। यह प्रसंग आनंद रामायण में प्रभु और भक्त के बीच के मधुर, अनौपचारिक और प्रेमपूर्ण संबंध को बहुत ही सुंदर ढंग से उजागर करता है। 🙏🙏 जय सियाराम 🙏🙏
Comments (6)

Rama Devi Sahu
Jun 30, 2026
🙏‼️ Hari Om Tat Sat ‼️🙏

Srikumar महाराज🇮🇳☸️
Jun 30, 2026
dukh or sukh he hi nahi sab apne apne dimag ka khel hai na sach na jhooth hai sab maya ka khel hai

Rama Devi Sahu
Jun 30, 2026
Ji, Jo bhi ho...Aane ke Pehle Sab kuch Tay karke Aate hai...dhukh ya Shukh...ise ko Sweekar karne ka Hamari Chunatiya... baki Bhagwan ki Ichha...!🙏 Subha Dopahar ki Ram Ram Ji 🌹🌹

Srikumar महाराज🇮🇳☸️
Jun 30, 2026
इस कहानी से हमें यह सीख मिलती है कि भक्त महान होता है। तकलीफ़ भी पास आने से पहले धरती है इसलिए ग्रंथ में लिखा है वो ही करो भाखरी या सेवा ही काफी है बाकी माया है फ़िजुल का राम राम आपका सदा मंगलमय हो

Rama Devi Sahu
Jun 30, 2026
चेहरे का सौंदर्य समय के साथ बदल सकता है, लेकिन आत्मा का सौंदर्य उसके गुणों की सुगंध से सदैव महकता रहता है। जब हमारे विचार पवित्र होते हैं, वाणी मधुर होती है और व्यवहार में प्रेम, शांति, करुणा व विनम्रता झलकती है, तब हमारा व्यक्तित्व बिना कुछ कहे ही लोगों के हृदय को स्पर्श करता है। ऐसे गुणों की सुगंध किसी इत्र से नहीं, बल्कि हर विचार, हर शब्द और हर कर्म से फैलती है।🌹🌹

