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Rama Devi Sahu

200 days ago

खिचड़ी की एक कथा : ओडिशा के जगन्नाथ मंदिर में ऐसी ही एक कथा खूब कही-सुनी जाती है, जहां अपनी एक भक्त को समाज स्थान दिलाने के लिए भगवान अपने भाई के साथ 12 वर्षों तक भूखे-प्यासे भटकते रहे. इस दौरान मंदिर का रत्न भंडार खाली हो गया, भगवान जगन्नाथ खुद कंगाल हो गए और इतनी दीन-हीन हो गए कि खाने को उन्हें खिचड़ी भी नसीब नहीं हुई. बहुत पुरानी बात है, जगन्नाथ पुरी में श्रिया नाम की एक महिला रहती थी। वह समाज के निम्न वर्ग से थी और अत्यंत निर्धन थी, लेकिन उसका मन भक्ति से समृद्ध था। वह माता लक्ष्मी की परम भक्त थी। एक बार मार्गशीर्ष (अगहन) मास के गुरुवार को उसकी इच्छा अष्टलक्ष्मी व्रत करने की हुई। श्रिया ने मंदिर के पंडितों से व्रत की विधि पूछनी चाही, लेकिन छुआछूत और भेदभाव के कारण उसे दुत्कार दिया गया। दुखी होकर वह भटकती रही और चक्कर खाकर गिर पड़ी। भक्त का कष्ट देख भगवान जगन्नाथ की विग्रह (मूर्ति) से रक्त बहने लगा। पुरी के राजा और पुजारी घबरा गए। उधर, भगवान के संकेत पर नारद मुनि ने साधु वेश में श्रिया को दर्शन दिए और कहा— "पुत्री! भक्ति में ऊंच-नीच नहीं होती। बस अपने घर को स्वच्छ रख, प्रेम से रह और शाम को श्रद्धा से खीर का भोग लगा।" श्रिया ने वैसा ही किया। उसकी भक्ति से प्रसन्न होकर माता लक्ष्मी स्वयं एक साधारण महिला के वेश में उसके घर पहुँचीं और उसे आशीर्वाद दिया। जब माता लक्ष्मी श्रीमंदिर लौटीं, तो भगवान जगन्नाथ के बड़े भाई बलभद्र अत्यंत क्रोधित हो गए। बलभद्र ने कहा— "लक्ष्मी! तुम एक 'अछूत' के घर होकर आई हो, तुमने श्रीमंदिर को अपवित्र कर दिया है। अब तुम यहाँ नहीं रह सकतीं।" जगन्नाथ जी ने अपने बड़े भाई की आज्ञा का मान रखते हुए माता लक्ष्मी को मंदिर से जाने को कह दिया। अपमानित होकर माता लक्ष्मी ने मंदिर छोड़ दिया, लेकिन जाते-जाते उन्होंने श्राप दिया— "स्वामी! जिस जाति-पाति के अहंकार में आप मुझे त्याग रहे हैं, अब आप दोनों भाई तब तक अन्न-जल को तरसेंगे, जब तक वही 'नीच' समझे जाने वाला व्यक्ति अपने हाथों से आपको भोजन न कराए।" लक्ष्मी के जाते ही श्रीमंदिर की आभा चली गई। देखते ही देखते रत्न भंडार खाली हो गए, अनाज सड़ गया और मंदिर में दीमक लग गई। भगवान के पास भोग लगाने के लिए एक दाना भी शेष न रहा। भूख से व्याकुल होकर जगन्नाथ और बलभद्र ने वेश बदला और भिक्षा मांगने निकले। लेकिन नियति का खेल ऐसा था कि वे जिस घर के सामने जाते, वह द्वार बंद हो जाता। जहाँ भोजन मिलता, वह राख बन जाता। १२ वर्षों तक दोनों भाई दर-दर भटकते रहे। अंत में, वे समुद्र तट पर एक सुंदर भवन के पास पहुँचे। वह भवन माता लक्ष्मी का ही था (जिन्होंने अपनी माया से उसे बनाया था)। बलभद्र ने सेविका से भोजन मांगा। सेविका ने कहा— "हमारी स्वामिनी नीच कुल की हैं, क्या आप यहाँ भोजन करेंगे?" अहंकार वश बलभद्र ने मना कर दिया और कहा— "हमें सामग्री दे दो, हम स्वयं बना लेंगे।" माता लक्ष्मी ने अग्नि देव को आदेश दिया कि चूल्हा न जले। धुएँ से परेशान होकर और भूख से टूटकर बलभद्र का अहंकार चूर-चूर हो गया। उन्होंने जगन्नाथ से कहा— "जगन! भूख के आगे कोई जाति नहीं होती। चलो, जो भी मिले वही ग्रहण करते हैं।" जैसे ही दोनों भाइयों ने उस घर की खिचड़ी चखी, उन्हें स्वाद से आभास हो गया कि यह स्वयं लक्ष्मी के हाथों का बना भोजन है। बलभद्र को अपनी भूल का अहसास हुआ और उन्होंने स्वीकार किया कि भक्ति और भोजन में कोई भेदभाव नहीं होता। भगवान जगन्नाथ और बलभद्र माता लक्ष्मी को ससम्मान वापस श्रीमंदिर लाए तब माता लक्ष्मी ने वरदान मांगा कि जगन्नाथ पुरी में मिलने वाला 'महाप्रसाद' (खिचड़ी और भात) ऐसा होगा जिसे राजा और रंक, ऊंच और नीच, सब एक ही बर्तन से खाएंगे और किसी को भी छुआछूत का दोष नहीं लगेगा। खिचड़ी इसीलिए सामाजिक भोजन मानी जाती है. यह समाज के हर वर्ग, जाति, संप्रदाय और अमीर-गरीब को एक साथ, एक पायदान पर ले आती है. इसलिए मकर संक्रांति के मौके पर खिचड़ी भोज का आयोजन किया जाता है. खिचड़ी ने कई बार भक्त और भगवान के बीच के अंतर को भी मिटा दिया और कई बार तो भगवान ने खुद खिचड़ी को वो हथियार बनाया जिसके जरिए वो समाज में एकता और समानता का पाठ पढ़ा सकें।

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