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Rama Devi Sahu

91 days ago

ऋषि मार्कंडेय और काल पर विजय बहुत प्राचीन काल की बात है। नर्मदा नदी के तट पर मृकण्डु नाम के एक तपस्वी ऋषि अपनी पत्नी मरुद्वती के साथ रहते थे। दोनों निःसंतान थे। वर्षों की कठोर तपस्या के बाद भगवान शिव प्रसन्न हुए और प्रकट होकर बोले, "वत्स, वर माँगो।" मृकण्डु हाथ जोड़कर बोले, "प्रभु, मुझे पुत्र चाहिए।" शिव मुस्कुराए, "तुम्हें दो विकल्प देता हूँ — एक गुणहीन पुत्र जो सौ वर्ष जिएगा, या एक परम तेजस्वी, ज्ञानी पुत्र जो केवल सोलह वर्ष तक जीवित रहेगा। बोलो, क्या चाहिए?" मृकण्डु ने आँख बंद कर लीं। एक क्षण सोचा और बोले, "महादेव, मुझे गुणवान पुत्र ही दीजिए। आयु भले ही छोटी हो, पर जीवन बड़ा होना चाहिए।" समय बीता। मरुद्वती की कोख से एक दिव्य बालक ने जन्म लिया। उसका नाम रखा गया — **मार्कंडेय**। बचपन से ही मार्कंडेय वेद-पुराण में प्रवीण हो गया। पाँच वर्ष की आयु में ही उसने सारे शास्त्र कंठस्थ कर लिए। आश्रम में जो भी आता, उसके मुख से ज्ञान की गंगा बहती देखकर चकित रह जाता। पर जैसे-जैसे मार्कंडेय बारहवें वर्ष की ओर बढ़ा, माता-पिता के मुख पर चिंता की रेखाएँ गहरी होने लगीं। एक दिन बालक ने पूछ ही लिया, "माता, पिता, आप दोनों मेरे जन्मदिन पर हँसते क्यों नहीं? सबके माता-पिता उत्सव मनाते हैं।" मरुद्वती की आँखें भर आईं। मृकण्डु ने भारी मन से सारा सत्य बता दिया — "पुत्र, तुम्हारी आयु केवल सोलह वर्ष है।" मार्कंडेय थोड़ी देर चुप रहा। फिर उसके चेहरे पर अद्भुत तेज आ गया। उसने माता-पिता के चरण छुए और बोला, "यदि मृत्यु निश्चित है, तो मैं उसे महादेव की गोद में बैठकर आते देखूँगा।" सोलहवें वर्ष के जन्मदिन से एक दिन पहले मार्कंडेय ने समुद्र तट पर रेत का शिवलिंग बनाया। ॐ नमः शिवाय का जाप करते हुए वो समाधि में लीन हो गया। रात बीती, प्रातः काल हुआ। आज उसका सोलहवाँ जन्मदिन था — आयु की अंतिम घड़ी। तभी आकाश में घोर गर्जना हुई। यमराज अपने भैंसे पर सवार, कालपाश लिए वहाँ आ पहुँचे। उन्होंने देखा, एक बालक शिवलिंग से लिपटा हुआ "महादेव, महादेव" जप रहा है। यमराज ने कहा, "बालक, तेरी आयु पूर्ण हुई। अब तुझे मेरे साथ चलना होगा।" मार्कंडेय ने आँखें नहीं खोलीं, बस शिवलिंग को और कसकर पकड़ लिया। यमराज ने क्रोध में कालपाश फेंका। पाश मार्कंडेय के साथ-साथ शिवलिंग से भी लिपट गया। उसी क्षण धरती काँप उठी। शिवलिंग फट पड़ा और उसमें से प्रचंड आग की लपटों के साथ स्वयं महाकाल प्रकट हुए — जटाएँ बिखरी हुईं, तीसरा नेत्र अग्नि उगलता हुआ, गले में नरमुंडों की माला। शिव ने त्रिशूल उठाया और गरजकर बोले, "यम, तेरा साहस कैसे हुआ मेरे भक्त पर पाश डालने का? जो मेरी शरण में है, काल भी उसका कुछ नहीं बिगाड़ सकता।" यमराज थर-थर काँपने लगे। हाथ जोड़कर बोले, "प्रभु, मैं तो केवल अपना धर्म निभा रहा था। आपने ही विधि का विधान बनाया है।" महादेव शांत हुए। उन्होंने मार्कंडेय के सिर पर हाथ रखा, "वत्स, तेरी भक्ति ने मृत्यु को भी हरा दिया। आज से तू चिरंजीवी हुआ। जब तक सृष्टि रहेगी, जब तक मेरा पूजन होगा, तब तक तू अमर रहेगा। और यम, सुनो — मेरा भक्त जहाँ मेरा नाम जपेगा, वहाँ तुम्हारा प्रवेश निषेध है।" यमराज ने सिर झुकाकर वरदान स्वीकार किया और लौट गए। कहते हैं, मार्कंडेय ऋषि आज भी अमर हैं। उन्होंने ही मार्कंडेय पुराण की रचना की, जिसमें दुर्गा सप्तशती है। नर्मदा तट पर जहाँ ये घटना हुई, वहाँ आज मार्कंडेश्वर महादेव का मंदिर है। सीख: सनातन धर्म में आयु की लंबाई नहीं, जीवन की गहराई महत्वपूर्ण है। सच्ची श्रद्धा और समर्पण के आगे काल की गति भी रुक जाती है। जो शिव के आश्रय में है, उसका कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकता।

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