
Rama Devi Sahu
85 days ago
* **गुरुदेव और ठाकुर जी का आगमन:** एक बार सहजो बाई ने अपने गुरुदेव को अपनी कुटिया में आमंत्रित किया था। उनकी अगवानी के लिए वह हाथों में पुष्प की थाल, गुलाब जल और पंखा लेकर खड़ी थीं। तभी भगवान श्री कृष्ण (ठाकुर जी) ने सहजो बाई की भक्ति की परीक्षा लेने का विचार किया। वह गुरुदेव के ठीक बगल में आकर चलने लगे। ठाकुर जी यह देखना चाहते थे कि सहजो बाई सामने आने पर पहले किसकी पूजा और वंदन करती हैं। * **सहजो बाई का निर्णय:** जैसे ही सहजो बाई ने देखा कि गुरुदेव के साथ गोविंद भी आ रहे हैं, वह तुरंत दौड़कर गईं। उन्होंने ठाकुर जी का हाथ पकड़ा, उन्हें खींचकर एक तरफ खड़ा किया और उनके हाथ में थाल थमाते हुए कहा कि चुपचाप खड़े रहो, गुरुदेव आ रहे हैं और मुझे उनकी पूजा करनी है। * **भगवान और भक्त का संवाद:** इस पर ठाकुर जी ने कहा कि सहजो, मैं भगवान हूँ, यह शरीर, आत्मा, बुद्धि और नेत्र सब मैंने ही तुम्हें दिए हैं। सहजो बाई ने अत्यंत सुंदर उत्तर देते हुए कहा कि प्रभु, तन और इंद्रियाँ आपने अवश्य दी हैं, लेकिन इनका सही उपयोग करना गुरुदेव ने ही सिखाया है। यदि गुरु न होते, तो इस शरीर से केवल सांसारिक भोग ही भोगे जाते, जैसे बाकी लोग कर रहे हैं। इसलिए आप तन देने का अभिमान न करें और चुपचाप खड़े रहें। * **गुरु भक्ति की जीत:** ठाकुर जी सहजो बाई की यह बात सुनकर स्तब्ध रह गए। जब ठाकुर जी ने कहा कि अंत में तुम मेरी ही प्राप्ति के लिए तड़पोगी, तब सहजो बाई ने दृढ़ता से कहा कि मैं अपने गुरुदेव के आश्रय में रहकर ऐसी भक्ति करूँगी कि स्वयं आपको मेरे लिए तड़पना पड़ेगा। उन्होंने स्पष्ट किया कि वह भगवान के लिए भी अपने गुरु का आश्रय कभी नहीं छोड़ सकतीं। इस कथा का सार यही है कि जीवन में भगवान से भी ऊँचा स्थान गुरु का होता है, क्योंकि गुरु ही हमें भगवान तक पहुँचने का मार्ग दिखाते हैं।
Comments (0)
No comments yet. Be the first to comment!
