
प्रशांत कुमार मिश्रा
109 days ago
एक ऐसी कथा, जहाँ एक ऋषि अप्सरा के मोह में 900 वर्षों तक समय का भान ही भूल गए 🙏✨ देवताओं के राजा इन्द्र को हमेशा यह भय बना रहता था कि कहीं कोई ऋषि अपनी कठोर तपस्या से इतना शक्तिशाली न बन जाए कि इन्द्रासन ही संकट में पड़ जाए। इसलिए जब भी कोई महर्षि घोर तप में लीन होते, इन्द्र उनकी साधना भंग करने के उपाय सोचने लगते। ऐसा ही एक प्रसंग महर्षि कंडु के साथ हुआ। गोमती नदी के शांत तट पर महर्षि कंडु वर्षों से कठोर तपस्या कर रहे थे। उनका तेज और तप इतना प्रबल था कि देवराज इन्द्र चिंतित हो उठे। उन्हें लगा कि यदि यह तपस्या पूर्ण हो गई, तो स्वर्ग का संतुलन बदल सकता है। इन्द्र ने अपनी सबसे सुंदर अप्सराओं में से एक — प्रम्लोचा — को ऋषि की तपस्या भंग करने के लिए भेज दिया। 🌸 प्रम्लोचा का रूप इतना अद्भुत था कि उसे देखकर बड़े-बड़े योगी भी विचलित हो जाते थे। जब वह ऋषि कंडु के सामने पहुँची, तो उनका मन भी डगमगा गया। वर्षों की तपस्या और वैराग्य धीरे-धीरे मोह में बदलने लगा। ऋषि कंडु प्रम्लोचा के प्रेम में इतने डूब गए कि उन्हें संसार और समय — दोनों का ही भान नहीं रहा। ध्यान, जप, तप, पूजा… सब पीछे छूट गया। वे उसके साथ गृहस्थ जीवन में ऐसे रम गए मानो वही उनका संपूर्ण संसार हो। समय बीतता गया… प्रम्लोचा अपना कार्य पूरा कर चुकी थी और अब स्वर्ग लौटना चाहती थी, लेकिन ऋषि उसके मोह में इतने बंध चुके थे कि उसे अपने से दूर नहीं जाने देते थे। अप्सरा भी डरती थी कि यदि वह ऋषि की इच्छा के विरुद्ध जाएगी, तो कहीं वे क्रोधित होकर उसे श्राप न दे दें। 🌿 फिर एक दिन अचानक ऋषि कंडु को ध्यान आया कि उन्होंने आज संध्या पूजा नहीं की। वे तुरंत उठे और बोले, “मैं नदी किनारे पूजा करने जा रहा हूँ।” यह सुनकर प्रम्लोचा आश्चर्यचकित रह गई। उसने मुस्कुराकर कहा, “आज अचानक आपको पूजा-पाठ की याद कैसे आ गई? इतने वर्षों से तो आप मेरे साथ ही जीवन व्यतीत कर रहे हैं।” ऋषि हैरान होकर बोले, “वर्षों से? तुम तो आज ही सुबह मेरे आश्रम आई हो!” यह सुनकर प्रम्लोचा स्तब्ध रह गई। उसने धीरे से कहा, “ऋषिवर… एक दिन नहीं, पूरे 907 वर्ष बीत चुके हैं।” ⚡ यह सुनते ही ऋषि कंडु के पैरों तले धरती खिसक गई। वे समझ ही नहीं पाए कि समय इतनी तेजी से कैसे निकल गया। अप्सरा के मोह में वे इतने डूब चुके थे कि उन्हें सदियों के बीत जाने का एहसास तक नहीं हुआ। तब प्रम्लोचा ने उन्हें पूरी सच्चाई बताई — कैसे इन्द्र ने उनकी तपस्या भंग करने के लिए उसे भेजा था और कैसे वे मोह-माया के जाल में फँस गए। सत्य जानकर ऋषि कंडु अत्यंत दुखी हुए। वे स्वयं को धिक्कारने लगे कि जिस माया को त्यागकर उन्होंने तपस्या आरंभ की थी, वही माया उनके जीवन के इतने वर्षों को निगल गई। 🙏 अंततः उन्होंने फिर से संसार के मोह का त्याग किया और पुनः कठोर तपस्या में लीन हो गए। ✨ यह कथा हमें सिखाती है कि मोह और आकर्षण मनुष्य को समय और सत्य दोनों से दूर कर सकते हैं। ✨ जब मन विषयों में उलझ जाता है, तब वर्षों भी क्षण जैसे बीत जाते हैं। ✨ साधना का मार्ग कठिन अवश्य है, लेकिन वही आत्मज्ञान की ओर ले जाता है। 🙏

Comments (2)

Pannalal panchal
May 13, 2026
ॐ नमो नारायण

Pannalal panchal
May 13, 2026
जय जय श्री गणेश
