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🚩🌺🚩🌺🚩🌺🚩🌺🚩🌺 *🚩🌺जलो वहाँ, जहाँ जरूरत हो, उजालों में दीपक का महत्व नहीं रहता ।।* 🚩🌺🚩🌺🚩🌺🚩🌺🚩🌺 *🚩🌺जीवन का सच्चा अर्थ तभी प्रकट होता है जब हम अपने अस्तित्व का उपयोग किसी सार्थक कार्य में करें। दीपक का मूल्य अंधकार में ही समझ आता है; उजाले में उसकी लौ भी अनदेखी रह जाती है। यही बात मनुष्य पर भी उतनी ही लागू होती है — जब हम अपनी ऊर्जा, ज्ञान और सामर्थ्य का उपयोग उस स्थान पर करते हैं जहाँ वास्तव में आवश्यकता है, तभी हमारा जीवन सार्थक बनता है।* *🚩🌺दीपक का स्वभाव है — जलना, स्वयं को गलाना और प्रकाश देना। परंतु यदि दीपक किसी प्रखर दिन के उजाले में जले, तो उसका अस्तित्व केवल औपचारिक रह जाता है। उसी प्रकार, जब कोई व्यक्ति पहले से सम्पन्न, शिक्षित या सुखी लोगों के बीच अपनी क्षमता का प्रदर्शन करता है, तो वह केवल अहंकार की अभिव्यक्ति बन जाती है।* *🚩🌺किंतु जब वही व्यक्ति किसी अंधकारमय कोने — जहाँ निराशा, अज्ञान या दुःख व्याप्त हो — वहाँ अपने प्रकाश से दूसरों का मार्ग आलोकित करता है, तब वह दीपक के समान पूज्य बन जाता है।* *🚩🌺सनातन धर्म में दीपक का विशेष महत्व है।* *🚩🌺दीपज्योतिर्नमस्तुभ्यं दीपदेव नमोऽस्तु ते — इस मंत्र में दीपक को ब्रह्म का प्रतीक माना गया है। वह अंधकार को नष्ट कर ज्ञान का प्रकाश फैलाता है। यही शिक्षा मानव के लिए भी है कि वह अपने गुणों का उपयोग समाज के अंधकार मिटाने में करे।* *🚩🌺महर्षि व्यास से लेकर महात्मा गांधी तक, सबने इसी विचार को जीवन में उतारा। गांधी जी ने स्वयं कहा था — “मैं वहाँ रहना चाहता हूँ जहाँ अंधकार है, ताकि अपने छोटे से दीपक से थोड़ी ज्योति पहुँचा सकूँ।”* *🚩🌺यह दृष्टिकोण समाज सुधार का मूल है। प्रकाश का अर्थ केवल ज्ञान नहीं, बल्कि करुणा, सेवा और न्याय भी है। जो व्यक्ति अपनी रोशनी उस दिशा में ले जाता है जहाँ दुःख, अन्याय या अज्ञान का अंधेरा है, वही वास्तव में दीपक का धर्म निभाता है।* *🚩🌺महाभारत में श्रीकृष्ण का जीवन भी इसका सुंदर उदाहरण है। वे वहाँ प्रकट होते हैं जहाँ धर्म संकट में है। वे उजालों में नहीं, अंधकार के समय में अवतरित होते हैं — ताकि धर्म का दीप फिर से प्रज्वलित हो सके। यही संदेश इस पंक्ति में छिपा है — “जलो वहाँ, जहाँ जरूरत हो।”* *🚩🌺आज के युग में भी इस संदेश की प्रासंगिकता कम नहीं हुई है। समाज में असमानता, अंधविश्वास, हिंसा और स्वार्थ का अंधकार फैला है।* *🚩🌺हमें चाहिए कि हम अपनी क्षमताओं का उपयोग वहीं करें जहाँ कोई सहारा नहीं। किसी गरीब बच्चे की शिक्षा में योगदान देना, किसी वृद्ध की सहायता करना, किसी निराश व्यक्ति को उत्साह देना — यही वह स्थल हैं जहाँ हमारी ज्योति की आवश्यकता है।* *🚩🌺उजालों में दीपक का महत्व नहीं रहता क्योंकि वहाँ पहले से ही चमक है। वहीं जलना केवल प्रदर्शन है। परंतु अंधेरे में जलना साहस है, सेवा है और सच्चा तप है। जो मनुष्य दूसरों के अंधकार को दूर करने के लिए जलता है, वही अपने भीतर का दिव्य प्रकाश भी देख पाता है।* *🚩🌺जैसे सूर्य समस्त सृष्टि को प्रकाशित करता है, वैसे ही हर मनुष्य भी अपने भीतर एक छोटा सूर्य रखता है — उसका विवेक, उसका करुण हृदय, उसका कर्म। उसे केवल सही दिशा में जलाने की आवश्यकता है।* *🚩🌺अतः, हमें यह स्मरण रखना चाहिए कि जीवन का मूल्य इस बात में नहीं कि हम कितने उज्ज्वल हैं, बल्कि इस बात में है कि हमारे उजाले से कितने अंधेरे दूर हुए।* *🚩🌺“जलो वहाँ, जहाँ जरूरत हो” — यह केवल एक पंक्ति नहीं, बल्कि जीवन का आदर्श है। जो व्यक्ति अपने अस्तित्व को दूसरों की भलाई में समर्पित करता है, वही सच्चे अर्थों में दीपक है।* *🚩🌺क्योंकि “दीपक वही पूज्य है, जो अंधकार में जलता है। उजालों में तो लौ भी अपनी पहचान खो देती है।”* 🚩🌺🚩🌺🚩🌺🚩🌺🚩🌺

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