
Rama Devi Sahu
50 days ago
आषाढ़ मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी को योगिनी एकादशी कहा जाता है। इसका वर्णन ब्रह्मवैवर्त पुराण में भगवान श्रीकृष्ण और धर्मराज युधिष्ठिर के संवाद में मिलता है। कुबेर की अलकापुरी में हेममाली नाम का एक यक्ष था। उसका कार्य प्रतिदिन मानसरोवर से पुष्प लाकर भगवान शिव की पूजा के लिए देना था। हेममाली अपनी पत्नी विशालाक्षी के प्रेम में इतना आसक्त हो गया कि एक दिन वह समय पर पुष्प नहीं ला सका। इससे भगवान शिव की पूजा में विलंब हो गया। जब कुबेर को इसका पता चला, तो उन्होंने क्रोधित होकर हेममाली को कुष्ठ रोग का शाप दिया और स्वर्ग से निकाल दिया। शाप के कारण वह अत्यंत दुखी होकर पृथ्वी पर भटकने लगा। एक दिन उसका सौभाग्य जागा और वह महर्षि मार्कण्डेय के आश्रम पहुँचा। ऋषि ने उसकी दुःखभरी कथा सुनकर कहा— "आषाढ़ कृष्ण पक्ष की योगिनी एकादशी का श्रद्धापूर्वक व्रत करो। भगवान विष्णु की उपासना करो। इससे तुम्हारे सभी पाप नष्ट हो जाएंगे।" हेममाली ने विधिपूर्वक योगिनी एकादशी का व्रत किया। व्रत के प्रभाव से उसका कुष्ठ रोग दूर हो गया, वह पुनः दिव्य शरीर प्राप्त कर अपनी पत्नी सहित कुबेर के लोक में लौट गया। योगिनी एकादशी का महत्व यह व्रत पापों का नाश करने वाला माना गया है। रोग, कष्ट और दुःखों से मुक्ति की कामना से यह व्रत किया जाता है। भगवान श्रीहरि विष्णु की कृपा प्राप्त होती है। श्रद्धा और नियमपूर्वक व्रत करने से मन की शुद्धि तथा आध्यात्मिक उन्नति होती है। व्रत मंत्र ॐ नमो भगवते वासुदेवाय नमः। जय श्रीहरि। योगिनी एकादशी की हार्दिक शुभकामनाएँ। 🙏🌸🌸

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