
Rama Devi Sahu
74 days ago
"एक प्रेम को साध रहीं तो, एक हैं सृष्टि को साधे" व्याख्या: कवि कहते हैं कि श्री राधा और श्री कृष्ण का अस्तित्व दो अलग-अलग दिव्य शक्तियों को दर्शाता है। एक तरफ श्री राधा जी हैं, जो निश्छल, निस्वार्थ और अनन्य 'प्रेम' की साधना कर रही हैं; उनका पूरा जीवन प्रेम का ही प्रतिरूप है। दूसरी तरफ साक्षात नारायण रूप श्री कृष्ण हैं, जो संपूर्ण ब्रह्मांड और 'सृष्टि' के संचालन व नियमों को साधे हुए हैं। "एक साथ तो एक ही लगते, पृथक हों तो आधे आधे" व्याख्या: जब ये दोनों एक साथ होते हैं, तो इनमें कोई भेद नहीं रह जाता—ये एक ही परम तत्व (उगल सरकार) प्रतीत होते हैं। इनके बीच द्वैत भाव समाप्त हो जाता है। लेकिन यदि इन्हें वैचारिक या व्यावहारिक रूप से अलग करके देखा जाए, तो दोनों एक-दूसरे के बिना अपूर्ण (आधे-आधे) हैं। कृष्ण के बिना राधा अधूरी हैं और राधा के बिना कृष्ण का नाम भी पूरा नहीं होता। "प्रेम में वृंदावन का कण कण, एक ही सुर में बोल रहा" व्याख्या: वृंदावन की पावन भूमि का एक-एक जर्रा, हर पेड़-पौधा, लता और पशु-पक्षी पूरी तरह से इस अलौकिक प्रेम के रंग में रंगा हुआ है। वहां की पूरी प्रकृति किसी अलग राग में नहीं, बल्कि केवल एक ही सुर और एक ही ध्वनि में स्पंदित हो रही है। "राधा बोलें कृष्ण कृष्ण, और कृष्ण कहें राधे राधे" व्याख्या: वह एक ही सुर यह है कि जब श्री राधा जी के मुख से अनवरत 'कृष्ण-कृष्ण' का जाप होता है, तो उसके प्रत्युत्तर में और उसी लय में श्री कृष्ण भी निरंतर 'राधे-राधे' पुकारते हैं। दोनों एक-दूसरे के नाम में इस तरह लीन हैं कि भक्त और भगवान, प्रेमी और प्रेमास्पद का भेद ही मिट गया है।

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