
प्रशांत कुमार मिश्रा
110 days ago
🌹रामचरित: लंकाकाण्ड🌹 ४४. 🌹भजि रघुपति करु हित आपना |🌹 🌹छाड़हुॅं नाथ मृषा जल्पना ||🌹 🌹नील कंज तनु सुन्दर स्यामा |🌹 🌹 हृदय राखु ल़ोचनाभिरामा ||🌹 🌹अर्थात् तुलसीदासजी कहते हैं कि हनुमानजी , श्रीरामजी के चरणकमलों को हृदय में रखकर पर्वत की ओर औषधि लेने चले , उधर एक दूत ने रावण को सब बात बतायी। रावण ने कालनेमि के घर जाकर हनुमान का मार्ग रोकने के लिए कहा , तब कालनेमि ने ब़ार- बार सिर धुना कि जिसने देखते- देखते नगर को जला दिया , उसके मार्ग को रोकने वाला कौन है ? उसने रावण से कहा कि हे नाथ ! श्रीरघुनाथजी का भजन करके अपना हित साधन करो और वृथा बकवाद छोड़ दो तथा नेत्रों को आनन्द देने वाले और नील- कमल के समान सुन्दर शरीर वाले प्रभु को अपने हृदय में धारण करो |🌹 🌹तात्पर्य यह है कि यदि हम संसार में अपना हित देखना चाहते हैं तो नेत्रों को आनन्द देने वाले और नीलकमल के समान सुन्दर दिव्य शरीर वाले प्रभु को अपने हृदय में धारण करके उनका भजन करते रहना चाहिए | जय जय सीताराम |🌹 🌹🙏🌹🙏🌹🙏🌹🙏🌹
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