
Rama Devi Sahu
294 days ago
श्री बाँके बिहारी जी के विग्रह (मूर्ति) के नेत्रों में एक ऐसा दिव्य और अवर्णनीय आकर्षण है कि एक बार यदि कोई भक्त उनसे एकटक दृष्टि मिला ले, तो वह उनके प्रेम में बंध जाता है। बिहारी जी भी इतने भावुक हैं कि वे अपने भक्त के प्रेम से मोहित होकर उसके साथ चल देते हैं। इसी से जुड़ी एक प्रसिद्ध घटना है। एक बार राजस्थान के एक राजा वृंदावन में बिहारी जी के दर्शन के लिए आए। वे ठाकुर जी के रूप-सौंदर्य पर इतने रीझ गए कि अपलक, बिना पलक झपकाए उन्हें निहारते रहे। उनकी भक्ति की यह तीव्रता बिहारी जी को इतनी भायी कि वे सचमुच अपना स्थान छोड़कर राजा के साथ उनके राज्य (राजस्थान) चले गए। जब वृंदावन के मंदिर के गोस्वामियों (पुजारियों) को मूर्ति के गायब होने का पता चला, तो वे अत्यंत दुखी हुए। बहुत अनुनय-विनय और खोजबीन के बाद, वे किसी तरह ठाकुर जी को वापस वृंदावन ला सके। इसी घटना के बाद से मंदिर में एक अनूठी परंपरा का आरंभ हुआ, जिसे 'झाँकी दर्शन' कहते हैं। इस परंपरा के अनुसार, हर कुछ मिनटों में मूर्ति के सामने पर्दा डाल दिया जाता है और फिर हटाया जाता है। यह इसलिए किया जाता है ताकि कोई भी भक्त उनसे लंबे समय तक दृष्टि न मिला सके और उन्हें अपने प्रेम के बंधन में बांधकर अपने साथ न ले जा सके। यह पर्दा दर्शन में बाधा नहीं, बल्कि उस अति-दिव्य शक्ति को नियंत्रित करने का एक तरीका है। यह दर्शाता है कि बिहारी जी अपने भक्त के प्रेम के प्रति कितने संवेदनशील और चंचल हैं।


