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Rama Devi Sahu

289 days ago

*💐💐संतान का रहस्य💐💐* राजस्थान के छोटे से गाँव “सीकरपुर” में हरिदास नाम का एक वृद्ध रहता था। जीवनभर उसने सत्य, धर्म और सेवा का पालन किया था। उसके घर में सब कुछ था — धन, सम्मान, गायें, खेत — पर एक बात की कमी थी, *संतान की।* हरिदास और उसकी पत्नी सावित्री ने अनेक तीर्थ किए, दान-पुण्य किया, परंतु उन्हें कोई संतान न मिली। एक दिन गाँव में एक संत आए। हरिदास ने आदरपूर्वक उनका स्वागत किया और कहा — “गुरुदेव! मैंने जीवनभर कोई अधर्म नहीं किया, फिर भी संतान का सुख मुझे क्यों नहीं मिला नवनीत?” संत मुस्कराए और बोले — “हरिदास, सब कुछ कर्मों से बंधा है। जो इस जन्म में मिलता है, वह पूर्व जन्मों के कर्मों का फल होता है। तुम्हारी संतान भी तभी आएगी, जब उसका तुम्हारे साथ कोई *ऋण या संबंध* होगा।” हरिदास ने जिज्ञासु होकर पूछा — “कैसा संबंध, गुरुदेव?” संत ने कहा — “शास्त्रों में चार प्रकार की संतान बताई गई है — ऋणानुबंध, शत्रु, उदासीन और सेवक पुत्र। यदि तुमने किसी का धन लिया था, तो वह संतान बनकर तुमसे अपना हक लेगा। यदि किसी जीव को सताया था, तो वह तुम्हें दुख देकर बदला लेगा। यदि तुमने किसी की सेवा नहीं की, तो ऐसी संतान न मिलेगी जो तुम्हारी सेवा करे। परंतु यदि तुमने किसी की निःस्वार्थ सेवा की है, तो वही आत्मा तुम्हारी सेवा करने के लिए पुत्र बनकर आएगी।” हरिदास ने गहराई से सोचा। उसे याद आया कि अपने युवावस्था में उसने एक वृद्ध साधु की सेवा की थी। वह साधु कई महीनों तक बीमार रहा, और हरिदास ने उसकी तन-मन-धन से सेवा की थी। अंत में साधु ने आशीर्वाद दिया था — “पुत्र! अगले जन्म में मैं तेरा पुत्र बनकर तेरा ऋण चुकाऊँगा।” संत ने मुस्कराते हुए कहा — “वही आत्मा अब तुम्हारे घर जन्म लेने वाली है। चिंता मत करो।” कुछ महीनों बाद चमत्कार हुआ — सावित्री ने एक सुंदर बालक को जन्म दिया। दोनों के जीवन में नई खुशी भर गई। हरिदास ने उसका नाम “गोविंद” रखा। समय बीतता गया। गोविंद बड़ा होकर एक आज्ञाकारी, विनम्र और बुद्धिमान बालक बना। वह हर सुबह अपने पिता के चरण छूता, गायों की सेवा करता और वृद्ध माता-पिता की हर इच्छा पूरी करता। गाँव में सब लोग कहते — “ऐसा पुत्र तो भाग्यवानों को ही मिलता है।” हरिदास के वृद्धावस्था में जब चलने की भी शक्ति नहीं रही, तब गोविंद ने उनका हाथ पकड़कर कहा — “पिताजी, आप जीवनभर दूसरों के लिए जिए, अब मैं आपके लिए जीना चाहता हूँ।” हरिदास की आँखों में आँसू थे। उसे संत की बातें याद आईं — “पूर्व जन्म की सेवा का फल संतान बनकर लौटता है।” एक रात हरिदास ने गोविंद से कहा — “बेटा, तू मेरा सच्चा धन है। सोना-चाँदी सब यहीं रह जाएगा, पर तू जो सेवा कर रहा है, वही तेरे भविष्य का पुण्य बनेगी।” कुछ वर्षों बाद हरिदास ने शांतिपूर्वक देह त्याग दी। गोविंद ने अपने पिता की शिक्षाओं को जीवन का आधार बनाया — वह हर जीव की सेवा करने लगा। गाँव के लोग कहते थे — “हरिदास अब अपने पुत्र के रूप में जीवित है।” कहानी का सार यही है कि — *संतान केवल शरीर से नहीं, कर्मों से जुड़ती है।* जो हम बोते हैं, वही अगले जन्मों में काटते हैं। यदि आज किसी की निःस्वार्थ सेवा करेंगे, तो वह आत्मा किसी न किसी रूप में लौटकर हमारी सेवा अवश्य करेगी। इसलिए अपने कर्मों को श्रेष्ठ बनाओ, क्योंकी वही तुम्हारा भविष्य गढ़ते हैं। “कर्म वही करो जो नेकी का हो,क्योंकि केवल नेकी ही साथ जाएगी।”

Comments (2)

Rama Devi Sahu

Rama Devi Sahu

Nov 16, 2025

Jai Shree Shyam 🙏🌹🌹

Rakesh Kumar

Rakesh Kumar

Nov 16, 2025

jai shree shyam 🙏