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Rama Devi Sahu

218 days ago

दुनिया उन्हें नेत्रहीन कहती है। लेकिन सच यह है कि उन्होंने वह देखा है, जो आँखों वाले भी नहीं देख पाए। आज वे 75 वर्ष के हैं। जन्म से दृष्टिहीन। पर ज्ञान की वह ज्योति, जो उनके भीतर जलती है, उसके सामने सूरज भी संकोच कर जाए। उनका नाम है — जगद्गुरु श्री रामभद्राचार्य। बचपन से ही उनका जीवन किसी चमत्कार से कम नहीं रहा। स्कूल की हर कक्षा में — 99 प्रतिशत से कम अंक कभी नहीं। जिसे लोग ‘अंधा’ कहते रहे, वह शास्त्रों के अंधकार को प्रकाश में बदलता चला गया। 230 से अधिक पुस्तकें। संस्कृत, वेद, रामायण, दर्शन, व्याकरण — ऐसा कोई क्षेत्र नहीं जहाँ उनका हस्ताक्षर न हो। कई विश्वविद्यालयों ने उन्हें महामहोपाध्याय और जगद्गुरु की उपाधि दी। लेकिन इतिहास उन्हें सबसे अधिक याद रखेगा श्री राम जन्मभूमि मामले के लिए। जब एक संत अदालत में खड़ा हुआ इलाहाबाद हाई कोर्ट। तीन सौ वकीलों से भरी अदालत। तर्क, शोर, राजनीति और अविश्वास से भरा वातावरण। और बीच में खड़े — एक नेत्रविहीन संत। उनसे पूछा गया — “क्या रामचरितमानस में राम जन्मभूमि का कोई उल्लेख है?” उन्होंने बिना रुके, बिना झिझके तुलसीदास की चौपाई सुना दी। फिर अगला वार हुआ — “वेदों में क्या प्रमाण है कि श्रीराम का जन्म यहीं हुआ?” इस बार उत्तर और भी गहरा था। उन्होंने कहा — “अथर्ववेद, दशम कांड, इकतीसवें मंत्र में इसका स्पष्ट उल्लेख है।” अदालत सन्न रह गई। और तभी न्यायाधीशों की पीठ से — जिसमें एक मुस्लिम न्यायाधीश भी थे — वह ऐतिहासिक वाक्य निकला: “सर, आप एक दिव्य आत्मा हैं।” 441 साक्ष्य। उनमें से 437 को न्यायालय ने स्वीकार किया। सोचिए — जिसे दुनिया ‘अंधा’ कहती है, वह भारत के सबसे विवादित इतिहास को प्रमाणों से देख रहा था। जब राजनीति भी मौन हो गई जब एक राजनीतिक हलफनामे में कहा गया कि “राम का जन्म नहीं हुआ,” तो यह संत मौन नहीं रहा। उन्होंने तत्कालीन प्रधानमंत्री को पत्र लिखा — और केवल एक पंक्ति ने सबको निरुत्तर कर दिया: “आपके गुरु ग्रंथ साहिब में राम नाम का उल्लेख 5600 बार है।” यह तर्क नहीं था। यह सांस्कृतिक स्मृति थी। क्या वे सच में अंधे हैं? एक बार प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने उनसे कहा — “मैं आपके इलाज और दर्शन की व्यवस्था कर सकती हूँ।” संत मुस्कुराए और बोले — “मैं दुनिया नहीं देखना चाहता।” बाद में एक इंटरव्यू में उन्होंने कहा — “मैं अंधा नहीं हूँ। मैंने कभी अंधे होने की रियायत नहीं ली। मैं भगवान श्री राम को बहुत पास से देखता हूँ।” और उस क्षण समझ में आता है — आँखों से देखना और दर्शन करना दो अलग बातें हैं। सनातन की जीवित मशाल ऐसे संत ग्रंथों में नहीं, समय में जन्म लेते हैं। वे इसलिए नहीं होते कि चमत्कार दिखाएँ, बल्कि इसलिए होते हैं कि सभ्यता को आईना दिखा सकें। अगर आज सनातन संस्कृति खड़ी है, तो उसके पीछे ऐसे ही मौन तपस्वियों की तपस्या है। उन्हें नेत्रहीन कहना शायद हमारी सबसे बड़ी दृष्टिहीनता है। ऐसे संतों को प्रणाम। ऐसी चेतना को नमन। जय श्री राम। 🚩🙏

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Comments (3)

Bajra Singh Chouhah  Bajra Singh Chouhah

Bajra Singh Chouhah Bajra Singh Chouhah

Jan 24, 2026

🕉️🙏🏻🙏🏻🙏🏻🕉️

Rama Devi Sahu

Rama Devi Sahu

Jan 24, 2026

🙏‼️ Jai Shree Ram 🙏 Jai Siya Ram 🙏 Shubha Shanivar ki Subha Dopahar Jii ‼️🙏