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Rama Devi Sahu

166 days ago

कल हमने देखा था - वन के मध्य एक सूना आश्रम। न पक्षियों की चहचहाहट। न मुनियों का जप। न अग्नि की लौ। केवल मौन… और एक शिला। राम ठहर गए थे। गुरुदेव, यह स्थान ऐसा क्यों है जहाँ जीवन होते हुए भी जीवन नहीं दिखता? विश्वामित्र बोले - यह गौतम ऋषि का आश्रम है। और यह शिला… कोई पत्थर नहीं… यह अहल्या है। कभी यह आश्रम तप और तेज से प्रकाशित था। अहल्या केवल रूपवती नहीं थीं, वे तेजस्विनी थीं। देवताओं तक में उनकी कीर्ति थी। पर जहाँ सौंदर्य होता है, वहाँ परीक्षा भी होती है। देवराज इन्द्र के मन में अहंकार जागा। उन्होंने गौतम का रूप धारण किया। आश्रम में प्रवेश किया। और छल किया। कुछ कथाएँ कहती हैं अहल्या पहचान गई थीं, कुछ कहती हैं वे भ्रमित हो गईं। पर एक क्षण की असावधानी ने जीवन बदल दिया। गौतम ऋषि लौटे। तप का तेज जब आहत होता है, तो वह अग्नि बन जाता है। इन्द्र को श्राप मिला। और अहल्या से कहा गया - तू अदृश्य रहेगी। शिला समान पड़ेगी। जब तक रघुनाथ के चरण स्पर्श न करें। ध्यान दीजिए - श्राप में भी आशा छिपी थी। वह दंड था… पर अंतहीन नहीं। वह प्रतीक्षा थी। वर्षों बीत गए। आश्रम उजड़ गया। ऋषि चले गए। समाज ने भुला दिया। और अहल्या… पत्थर बनी… पर भीतर चेतना जीवित। सोचिए उस पीड़ा को। न बोल सकती थीं। न रो सकती थीं। न अपनी बात कह सकती थीं। कभी-कभी जीवन में मनुष्य भी ऐसा ही हो जाता है। लोग निर्णय सुना देते हैं। और व्यक्ति भीतर से पत्थर हो जाता है। पर उस पत्थर के भीतर एक ही जप था - राम। आज वही क्षण आया। राम आगे बढ़े। उन्होंने शिला को देखा। उनकी आँखों में न आरोप था, न कठोरता। केवल करुणा। उन्होंने चरण बढ़ाया। परसत पद पावन सोक नसावन प्रगट भई तपपुंज सही। जैसे शुष्क भूमि पर वर्षा की पहली बूँद गिरी हो। शिला काँपी। तेज फैला। एक दिव्य नारी प्रकट हुई। अहल्या। अति प्रेम अधीरा पुलक शरीरा मुख नहिं आवइ बचन कही। वर्षों की जमी हुई पीड़ा आँसुओं में बह निकली। वाणी रुद्ध थी। हृदय भरा हुआ। उन्होंने राम के चरण पकड़ लिए। मैं नारि अपावन प्रभु जग पावन… पाहि पाहि सरनहिं आई। और फिर जो कहा, वह और भी मार्मिक है - मुनि श्राप जो दीन्हा अति भल कीन्हा परम अनुग्रह मैं माना। उन्होंने श्राप को भी अनुग्रह माना। क्योंकि उसी ने उन्हें राम के दर्शन कराए। यह सुनकर हृदय पिघल जाता है। कितनी बार जीवन हमें गिराता है। कितनी बार समाज हमें पत्थर बना देता है। पर यदि भीतर प्रतीक्षा जीवित हो - तो राम अवश्य आते हैं। राम ने दंड नहीं दिया। उन्होंने सम्मान लौटाया। गौतम ऋषि भी प्रकट हुए। क्रोध शांत हो चुका था। आश्रम में पुनः जीवन लौट आया। यह केवल अहल्या का उद्धार नहीं था। यह संदेश था -जो गलती से गिरा है, वह उठ सकता है। जो पत्थर बना है, वह फिर से प्राण पा सकता है। यदि हृदय में पश्चाताप और प्रतीक्षा हो। रामायण संदेश -ईश्वर न्याय से पहले करुणा रखते हैं। वे दोष देखने नहीं आते, वे भीतर छिपी आस्था जगाने आते हैं। हरि अनंत, हरि कथा अनंता। 🙏🚩🌺जय सियाराम🌺🚩🙏

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Comments (5)

R k jangid 

phulera Jaipur

R k jangid phulera Jaipur

Mar 17, 2026

जय हो संकट मोचन हनुमान जी की 🙏

Rama Devi Sahu

Rama Devi Sahu

Mar 17, 2026

🙏‼️ Jai Shree Ram 🙏 Jai Siya Ram 🙏 Shubha Dopahar Jii 🙏🌹

Selvaraj T

Selvaraj T

Mar 17, 2026

🛕🛕🛕🛕🛕🛕ஜெய் பஜ்ஜிராகபலி ஸ்ரீ அனுமார் 🛕🛕🛕🛕and 🌺🌺🌺Good After Noon 🌺🌺🌺

Rama Devi Sahu

Rama Devi Sahu

Mar 17, 2026

राम रामेति रामेति रमे रामे मनोरमे ! सहस्रनाम तत्तुल्यं रामनाम वरानने !! पवित्र मन और निस्वार्थ कर्म ही इंसान को सुख की तरफ़ ले जाता है......!!! #जय_श्री_राम 🙏🚩 #शुभ_प्रभात_वंदन 🙏

vijay kushwaha

vijay kushwaha

Mar 17, 2026

जय जय श्री राम