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Rama Devi Sahu

463 days ago

कौन थीं, राधा, सीता, और पार्वती जी की माँ पितरों की तीन मानसी कन्याओं की कथा जगदम्बिका माँ पार्वती, सीता मैया और राधारानी जी का आपस में सम्बन्ध है। जी हाँ, शायद आपने भी पितरों की मानसी पुत्रियों के बारे में सुना या पढ़ा होगा। चलिए आज पितृ-पक्ष के समय, आपको श्री शिवमहापुराण में से एक ऐसी ही कथा के बारे में बताते हैं जो जुड़ी है पितरों की मानसी कन्याओं के साथ। इस कथा में उन्हें मिला शाप ही उनके लिए वरदान बन गया। पूर्वकाल में प्रजापति दक्ष की साठ पुत्रियाँ थी, जिनका विवाह ऋषि कश्यप आदि के साथ किया गया। इनमें से स्वधा नामक पुत्री का विवाह दक्ष ने पितरों के साथ किया। कुछ समय के बाद पितरों के मन से प्रादुर्भूत तीन कन्याएँ स्वधा को प्राप्त हुईं। बड़ी कन्या का नाम मेना, मझली का नाम धन्या और सबसे छोटी कन्या का नाम कलावती था। ये तीनों कन्याएँ ही बहुत सौभाग्यवती थीं। एक बार की बात है, तीनों बहनें, श्री विष्णु के दर्शन करने के लिए श्वेतद्वीप गईं। भगवान् विष्णु के दर्शन कर, वे प्रभु की आज्ञा से वहीं रुक गईं। उस समय वहाँ एक बहुत बड़ा समाज एकत्रित हुआ था। उस समाज में अन्य सभी के साथ ब्रह्मा जी के पुत्र सनकादि भी उपस्थित हुए। सनकादि मुनियों को वहाँ आया देख सभी ने उन्हें प्रणाम किया और वे सब अपने-अपने स्थान से उठ खड़े हुए। लेकिन महादेव की माया से सम्मोहित हो कर तीनों बहनें वहाँ अपने-अपने स्थान पर बैठी रहीं और विस्मित होकर उन मुनियों को देखती रहीं। कहते हैं न कि शिवजी की माया बहुत ही प्रबल है, जो सब लोगों को अपने अधीन रखती है अर्थात उनकी इच्छा के विरुद्ध कुछ नहीं होता और इस बार भी कुछ ऐसा ही हुआ। सनकादि के स्वागत-सत्कार में जब तीनों बहनें उठी नहीं, तो सनकादि जैसे महान ज्ञाता मुनिश्वरों ने उन तीनों बहनों पर क्रोध किया। सनत्कुमार ने दण्डित करने के लिए उन्हें शाप दे दिया। सनत्कुमार ने कहा, ‘तुम तीन बहनें पितरों की कन्या हो, तब भी तुम मूर्ख, सद्ज्ञान से रहित और वेदतत्व के ज्ञान से खाली हो। अभिमान के कारण तुम तीनों ने हमारा अभिवादन नहीं किया और तुम नरभाव से मोहित हो गई हो इसलिए तुम स्वर्ग से दूर हो कर, मनुष्यों की स्त्रियाँ बन जाओगी।’ जब शिवजी की माया तीनों बहनों से दूर हुई, तब तीनों ने सनकादि के चरण पकड़ लिए और उनसे कहा कि मूर्ख होने के कारण हम ने आपका आदर-सत्कार नहीं किया। अपने किए का फल हमें स्वीकार है। हम अपनी गलती की क्षमा माँगते हैं और हे महामुने! हम पर दया कीजिए। आप हमें, पुनः स्वर्गलोक की प्राप्ति हो सके, उसका उपाय बताइए। साध्वी कन्याओं से प्रसन्न हो कर सनत्कुमार बोले कि सबसे बड़ी पुत्री विष्णु जी के अंशभूत हिमालय पर्वत की पत्नी होगी, जिसकी पुत्री स्वयं माँ जगदम्बिका पार्वती होंगी। धन्या नामक कन्या का विवाह राजा सीरध्वज जनक से होगा, जिनकी पुत्री स्वयं श्री लक्ष्मी होंगी और उसका नाम सीता होगा। इसी प्रकार से तीसरी और सबसे छोटी कन्या, कलावती का विवाह वृषभानु से होगा, जिनकी पुत्री के रूप में द्वापर के अंत में श्री राधारानी जी प्रकट होंगी। इस प्रकार तीनों ही बहनें, तीन महान देवियों की माता होने का सुख पाएँगी और समय आने पर अपने-अपने पति के साथ स्वर्ग को चली जाएँगी। सनत्कुमार ने इन्हें आशीर्वाद देते हुए कहा कि महादेव की भक्ति के फल के रूप में ये तीनों बहनें हमेशा ही पूजनीय रहेंगी। कालांतर में पितरों की सबसे बड़ी पुत्री मेना का विवाह हिमालय पर्वत के साथ हुआ और उन्हें पुत्री के रूप में स्वयं माँ जगदम्बिका, पार्वती जी प्राप्त हुईं। शिवजी को पतिरूप में प्राप्त करने के लिए पार्वती जी ने कठोर तपस्या की और अपनी पुत्री के वरदान स्वरूप मेना और उनके पति हिमालय अपने उसी शरीर के साथ परम पद कैलाश को चले गए। वहीं धन्या का विवाह जनकवंश में उत्पन्न हुए राजा सीरध्वज के साथ हुआ। और उनकी संतान के रूप में सीता जी का साथ उन्हें मिला। सीता जी का विवाह विष्णु जी के अवतार, श्री राम से हुआ। स्वयं श्री लक्ष्मी जिनकी पुत्री हुई, उन साध्वी माता धन्या ने, अपने पति के साथ वैकुण्ठ लोक को प्राप्त किया। पितरों की सबसे छोटी बेटी का विवाह वृषभानु जी से हुआ और इन्हें श्री राधारानी जी की माँ होने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। ये अपनी पुत्री के साथ ही गोलोक को चली गईं। सनत्कुमार के द्वारा पितरों की मानसी कन्याओं को प्राप्त शाप ही उनके उद्धार का कारण बना और मनुष्य योनि में आने के बाद भी तीनों बहनों को शिवलोक, वैकुण्ठ और गोलोक की प्राप्ति हुई। हमें आशा है कि सनातन की कथाओं को आप तक पहुँचाने का हमारा यह प्रयास आपको पसंद आएगा। इस प्रकार की और अधिक कथाओं को जानने के लिए हमारे ग्रुप को जॉइन करना न भूलें। ॐ नमः शिवाय #અમૃતબિન્દુ

Comments (1)

Suresh Kumar

Suresh Kumar

May 24, 2025

राधे राधे जी 🙏शुभ रात्री वंदन