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Rama Devi Sahu

50 days ago

नाम जप की आदत.... भक्त भगवान् के मिलन की अपेक्षा भगवान् के भजन को अधिक प्रिय समझता है। भजन जब जीवन बन जाता है तब उसके बिना रहा नहीं जाता है। कोई कहे भी के छोड़ दो तब कहेंगे कि छोड़े कैसे रहा नहीं जाता है। एक महात्मा की सच्ची घटना का उल्लेख यहाँ कर दें। चैतन्य महाप्रभु के शिष्यों में एक सज्जन थे। उनका नाम-जप का इतना अभ्यास था, उनकी जीभ इतनी अभ्यस्त हो गयी थी और उनको इतना मजा-आनन्द आता था कि सोने में भी उनका नाम जप होता रहता था। जब नींद में भी जप हो तो जाग्रत अवस्था में क्यों न हो। एक दिन वह जंगल में शौच के लिये गये। उनका नाम जप चल रहा था। एक सज्जन उनके पीछे हो लिये। जो दोष देखने वाले होते हैं, उनका काम ही यही होता है। ऐसा मैंने भी देखा है कि जब ध्यान करते हैं तब कई लोग कहते हैं कि अमुक-अमुक व्यक्ति सो रहा था, मैंने देखा है। मैंने पूछा कि आप क्या कर रहे थे ? दूसरे के दोष बिना हुए और बिना जाने-समझे कहने में उन्हें आनन्द मिलता है। खैर, उस व्यक्ति ने आकर महाप्रभु से कहा- महाराज ! यह आदमी इतना गन्दा है कि शौच करते हुए भी भगवान् का नाम लेता है। महाप्रभु ने कहा- ऐसा करता है ? उसने कहा- हाँ, ऐसा करया है। महाप्रभु ने कहा- उसे बुलाओ। वे सज्जन आये तब महाप्रभु ने कहा- यह कह रहा है कि तुम शौच करते हुए भी भगवान् का नाम लेते हो। वे बोले- हाँ ऐसा करता हूँ। महाप्रभु ने कहा- ऐसा नहीं करना चाहिये। उन्होंने कहा-ठीक है। फिर दूसरे दिन जब वे महात्मा शौच को गये तब फिर वह गया और देखा कि वे शौच कर रहे हैं और जीभ पकड़े हुए बैठे हैं। उसने आकर फिर महाप्रभु से कहा- महाराज ! वह तो अत्यन्त भ्रष्ट है। कल तो केवल बोल ही रहा था परन्तु आज तो शौच करते हुए हाथ-मुख में ड़ाले हुए था। महाप्रभु ने कहा-ऐसी बात है तब उसे बुलाओ। वह आया तो महाप्रभु ने कहा-ये कह रहे हैं कि तुम शौच करते हुए हाथ मुँह में हाथ रखे थे। उन्होंने कहा- महाराज ! ये ठीक कह रहे हैं। परन्तु आपने ही तो कहा था कि शौच करते समय नाम मत लेना।मेरी जीभ मानती ही नहीं तो मैं क्या करूँ ? आपकी आज्ञा थी इसलिये जीभ पकड़कर बैठा था। महाप्रभु ने कहा-अब तुम जाओ और हमेशा जप किया करो। इस प्रकार जप जिसके जीवन का स्वभाव बन जाता है वह भजन है। अगर भजन न रहे तो जीवन न रहे। भगवान् की स्मृति ही जीवन है। ”जय जय श्री राधे”🙏🏻

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