
Rama Devi Sahu
14 days ago
सूर्य देव के परिवार और माता संज्ञा-छाया की पौराणिक कथा हिन्दू पौराणिक शास्त्रों और पुराणों (विशेषकर विष्णु पुराण और मत्स्य पुराण) के अनुसार, भगवान सूर्य देव का परिवार और उनके संतानों की उत्पत्ति की कथा अत्यंत रोचक और रहस्यमयी है। १. सूर्य देव और माता संज्ञा का विवाह भगवान सूर्य देव का विवाह देव शिल्पी महाराज विश्वकर्मा की पुत्री संज्ञा (सरण्या) से हुआ था। विवाह के पश्चात माता संज्ञा से सूर्य देव की तीन संतानें हुईं: वैवस्वत मनु: वर्तमान मन्वंतर के अधिपति और मानव जाति के प्रथम पूर्वज। यमराज: मृत्यु और न्याय के देवता। यमुना (यमी): पवित्र यमुना नदी की देवी। भगवान सूर्य का ताप और तेज अत्यधिक प्रचंड था। माता संज्ञा एक पतिव्रता देवी थीं, लेकिन वे सूर्य देव के उस असहनीय तेज और गर्मी को सहन नहीं कर पा रही थीं। २. छाया (सवर्णा) की सृष्टि और संज्ञा की तपस्या जब माता संज्ञा के लिए सूर्य देव का तेज सहन करना असंभव हो गया, तो उन्होंने कठिन तपस्या करके शक्ति अर्जित करने का निर्णय लिया। जाने से पूर्व, माता संज्ञा ने अपने ही समान रूप, रंग और गुण वाली एक प्रतिरूप (अपनी परछाई) को उत्पन्न किया, जिसका नाम 'छाया' (सवर्णा) रखा गया। संज्ञा ने छाया को निर्देश दिया: "तुम सूर्य देव की पत्नी और मेरी संतानों की माता बनकर यहाँ रहो, परंतु यह रहस्य किसी को मत बताना।" इसके बाद माता संज्ञा वहाँ से चली गईं और उत्तरकुरु देश के जंगलों में 'घोड़ी' (अश्विनी) का रूप धारण कर सूर्य देव के ताप को सहने की शक्ति पाने के लिए कठोर तपस्या करने लगीं। ३. माता छाया और शनि देव का जन्म सूर्य देव को इस रहस्य का ज्ञात नहीं था; वे छाया को ही संज्ञा समझते रहे। समय के साथ, सूर्य देव और माता छाया से तीन दिव्य संतानों का जन्म हुआ: शनि देव: कर्मफल दाता और न्यायप्रिय ग्रह। (गर्भकाल के दौरान माता छाया के भगवान शिव की कठोर तपस्या और धूप में रहने के कारण शनि देव का रंग श्याम हुआ)। सावर्णि मनु: भविष्य के आठवें मन्वंतर के अधिपति। तपती: पवित्र तपती नदी की देवी। ४. रहस्य का उजागर होना माता छाया अपनी स्वयं की संतानों (शनि, तपती आदि) से अधिक स्नेह करती थीं और संज्ञा की संतानों (यम और यमुना) के प्रति थोड़ा पक्षपात करने लगीं। एक दिन क्रोधित होकर बालक यमराज ने छाया को पैर से मारने का प्रयास किया, जिस पर माता छाया ने यमराज को श्राप दे दिया। यह देखकर सूर्य देव आश्चर्यचकित रह गए, क्योंकि एक सगी माता अपने ही पुत्र को कभी श्राप नहीं दे सकती। जब सूर्य देव ने छाया से सत्य बताने को कहा, तब भयभीत होकर छाया ने पूरा रहस्य खोल दिया कि वह संज्ञा नहीं, बल्कि उनकी प्रतिरूप छाया हैं। ५. सूर्य देव के तेज का शमन और अश्विनी कुमारों का जन्म सत्य जानने के बाद सूर्य देव अपने ससुर महाराज विश्वकर्मा के पास पहुंचे। महाराज विश्वकर्मा ने सूर्य देव के अतिरिक्त प्रचंड तेज को अपने यंत्रों से छांटकर कम कर दिया, ताकि उनका स्वरूप सहनीय और सौम्य हो सके। इसके पश्चात, सूर्य देव अपनी पत्नी संज्ञा को खोजने के लिए वन में गए, जहाँ संज्ञा अश्विनी (घोड़ी) के रूप में तपस्या कर रही थीं। माता संज्ञा के पास पहुंचकर सूर्य देव ने भी 'अश्व' (घोड़े) का रूप धारण किया। उसी अश्व और अश्विनी रूप के दिव्य संयोग से दो जुड़वां भाइयों अश्विनी कुमार (दस्त्र और नासत्य) का जन्म हुआ, जो आगे चलकर देवताओं के राजवैद्य (चिकित्सक) बने। इसी रूप से उनके एक और पुत्र रेवंत का भी जन्म हुआ। अंततः, भगवान सूर्य देव माता संज्ञा को ससम्मान अपने धाम वापस ले आए और तब से संज्ञा तथा छाया दोनों सूर्य देव की शक्ति और अर्धांगिनी के रूप में पूजी जाने लगीं।

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