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हर अधूरा रिश्ता समाप्त नहीं होता... कुछ आत्माएँ अगले जन्म की प्रतीक्षा में भी मौन रहती हैं। जीवन में कुछ रिश्ते ऐसे होते हैं जिनका अंत कभी समझ नहीं आता। न कोई अंतिम विदाई होती है, न कोई अंतिम उत्तर, न कोई अंतिम शिकायत। बस एक दिन कोई चला जाता है... और उसके बाद वर्षों तक मन उसी दरवाज़े पर खड़ा रहता है जहाँ से वह आख़िरी बार मुड़कर गया था। समय बीत जाता है, मौसम बदल जाते हैं, चेहरे बदल जाते हैं, शहर बदल जाते हैं, लेकिन कुछ प्रतीक्षाएँ नहीं बदलतीं। वे मन के भीतर उसी स्थान पर बैठी रहती हैं जहाँ पहली बार दर्द ने जन्म लिया था। तभी कभी-कभी मन में एक प्रश्न उठता है—क्या सचमुच हर रिश्ता इस जन्म में ही समाप्त हो जाता है? भारतीय दर्शन और अनेक आध्यात्मिक परंपराएँ पुनर्जन्म और कर्म की चर्चा करती हैं। उसी दृष्टि से कुछ लोग यह मानते हैं कि आत्मा की यात्रा एक जीवन तक सीमित नहीं होती। यह आस्था का विषय है, प्रमाण का नहीं। फिर भी कई लोगों को अपने अनुभवों में ऐसा लगता है कि कुछ मिलन और कुछ बिछड़नें केवल वर्तमान जीवन की कहानी से बड़ी प्रतीत होती हैं। वकई बार कुंडलियाँ देखते हुए मैंने एक बात अवश्य महसूस की है। कई बार सप्तम भाव विवाह का संकेत देता है, पंचम भाव प्रेम की क्षमता दिखाता है, चंद्रमा गहरी भावनाएँ बताता है, शुक्र आकर्षण देता है, राहु किसी संबंध को असाधारण बना देता है और केतु उसी संबंध में एक अनकहा विरह छोड़ जाता है। फिर भी दो लोग मिलकर भी पूरे नहीं हो पाते। ऐसा नहीं कि इसका कारण हमेशा पूर्वजन्म ही हो; वर्तमान जीवन की परिस्थितियाँ, निर्णय, स्वभाव और समय भी उतने ही महत्वपूर्ण होते हैं। लेकिन कभी-कभी ऐसा लगता है जैसे कुंडली कह रही हो—"यह मिलन केवल साथ रहने के लिए नहीं था... यह तुम्हें बदलने के लिए था।" कुछ लोग हमारे जीवन में जीवनभर रहने नहीं आते, वे केवल हमारे भीतर एक ऐसा प्रश्न छोड़ जाते हैं जिसका उत्तर हमें स्वयं बनना पड़ता है। कभी-कभी मैं सोचता हूँ कि भगवान हर रिश्ते को अंत तक पहुँचाने के लिए नहीं बनाते। कुछ रिश्ते केवल इसलिए आते हैं कि आत्मा को उसका सबसे कठिन पाठ पढ़ा सकें। जीवन में कुछ लोग ऐसे मिलते हैं जिनसे हमारा परिचय बहुत छोटा होता है, लेकिन उनका प्रभाव पूरी उम्र साथ चलता है। वे हमारे साथ वर्षों नहीं रहते, फिर भी उनकी स्मृतियाँ हमारे भीतर वर्षों तक जीवित रहती हैं। समय हमें आगे बढ़ना सिखा देता है, लेकिन मन के किसी शांत कोने में उनका नाम अब भी बिना आवाज़ लिए गूँजता रहता है। यही वह स्थान है जहाँ ज्योतिष केवल विवाह या प्रेम का गणित नहीं रह जाता, बल्कि मन, कर्म और अनुभव का विज्ञान बन जाता है। पंचम भाव केवल प्रेम नहीं बताता, वह हृदय की भाषा भी बताता है। सप्तम भाव केवल विवाह नहीं बताता, वह आत्मा के दर्पण जैसे संबंधों का संकेत भी देता है। अष्टम भाव केवल संकट नहीं है, वह उन गहरे परिवर्तनों का स्थान भी है जहाँ एक रिश्ता मनुष्य को पहले जैसा रहने ही नहीं देता। और जब चंद्रमा इन अनुभवों को अपने भीतर संजो लेता है, तब व्यक्ति बाहर से सामान्य दिखाई देता है, लेकिन भीतर कहीं कोई कहानी अब भी अधूरी चल रही होती है। राहु ऐसे संबंधों में कई बार असाधारण आकर्षण, बेचैनी और अधूरी चाह का प्रतीक बनकर दिखाई देता है। ऐसा आकर्षण जो तर्क से नहीं चलता। ऐसा लगाव जिसे व्यक्ति स्वयं भी समझ नहीं पाता। दूसरी ओर केतु कई बार उसी संबंध को मौन में बदल देता है। शब्द समाप्त हो जाते हैं, मुलाकातें समाप्त हो जाती हैं, लेकिन स्मृति समाप्त नहीं होती। यह हर कुंडली में ऐसा होगा, ऐसा कहना उचित नहीं; फिर भी अनेक ज्योतिषीय परंपराएँ इन ग्रहों को इच्छा और विरक्ति के प्रतीकों के रूप में देखती हैं। शायद इसी कारण कुछ लोग वर्षों बाद भी किसी एक चेहरे को भूल नहीं पाते। कारण केवल प्रेम नहीं होता, कभी-कभी वह अनुभव उनके व्यक्तित्व का हिस्सा बन चुका होता है। वह रिश्ता भले समाप्त हो गया हो, लेकिन उसने जो मनुष्य बनाया, वह आज भी जीवित है। और शायद यही कारण है कि जीवन के सबसे गहरे बिछड़ाव हमें ईश्वर के सबसे निकट भी ले जाते हैं। जब सब साथ छोड़ देते हैं, तब मन पहली बार स्वयं से मिलता है। जब कोई अपना दूर चला जाता है, तब पहली बार समझ आता है कि प्रेम अधिकार नहीं, अनुभव है। शायद इसी कारण कुछ अधूरी कहानियाँ पूरी होने के लिए नहीं लिखी जातीं। वे इसलिए लिखी जाती हैं कि मनुष्य प्रेम का अर्थ समझ सके, विरह का अर्थ समझ सके, क्षमा का अर्थ समझ सके, और अंततः यह समझ सके कि जीवन म

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