
Rama Devi Sahu
183 days ago
जगन्नाथ जी की होली – वृंदावन, मथुरा और नीलाचल की पावन हवाओं में जब फाल्गुन की सुगंध घुलती है, तब भक्ति और प्रेम रंगों में बदल जाते हैं। कहते हैं कि एक बार फाल्गुन मास में भक्तों के मन में यह भाव उठा कि काश आज स्वयं जगन्नाथ जी भक्तों संग होली खेलें। पुरी धाम में जगन्नाथ मंदिर के प्रांगण में भक्तों की भीड़ उमड़ी हुई थी। सबके हाथों में गुलाल, चेहरे पर उत्साह और हृदय में भक्ति थी। तभी ऐसा लगा मानो स्वयं जगन्नाथ जी मुस्कुरा रहे हों। उनकी बड़ी-बड़ी आँखों से करुणा और आनंद झलक रहा था। भक्तों ने प्रेम से गुलाल अर्पित किया। तभी अचानक वातावरण में रंगों की वर्षा होने लगी। ऐसा प्रतीत हुआ मानो भगवान स्वयं अपने भक्तों के साथ रंग बरसा रहे हों। उस दिन किसी ने किसी में भेद नहीं देखा—सब एक ही रंग में रंग गए, प्रेम के रंग में। जगन्नाथ जी के साथ उनके बड़े भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा भी विराजमान थे। तीनों की छवि ऐसी लग रही थी मानो स्वयं ब्रह्मांड आनंद में डूब गया हो। भक्त कहते हैं कि उस दिन रंग केवल चेहरे पर नहीं, आत्मा पर लगा था। बलभद्र जी की गंभीरता भी रंगों में खिल उठी और सुभद्रा जी की कोमल मुस्कान से वातावरण मधुर हो गया। आज भी जब होली आती है, तो भक्त जगन्नाथ जी को रंग अर्पित करते हैं। यह केवल परंपरा नहीं, एक जीवंत अनुभूति है कि भगवान दूर नहीं—वे हमारे उत्सवों, हमारी खुशियों और हमारे प्रेम में सदा सहभागी हैं। जय जगन्नाथ! 🌷🌷🌷

Comments (2)

Rama Devi Sahu
Feb 28, 2026
🙏‼️ Jai Jagannath ‼️🙏Din ki Shuruwat Shri Jagannath Ji ki Naam se Hona Chahiye 🙏 Shree Jagannath Ji Sabhi ke Prati Dayalu hai...🙏‼️ Jai Jagannath Swami Nayan Path Gami Bhava Tume ‼️🙏

Srikumar महाराज🇮🇳☸️
Feb 28, 2026
दिन की शुरुआत श्री जगन्नाथ के नाम से होती है। 🙏पद्मनाभ, बेडगरवहस्य, चन्द्र सूरज्या बिलोचनः जगन्नाथ, लोकानाथ, निलाद्रिह सो पारो हरि दीनबंधु, दयासिंधु, कृपालुं च रक्षकः कम्बु पानि, चक्र पानि, पद्मनाभो, नरोतमः जग्दम्पा रथो व्यापी, सर्वव्यापी सुरेश्वराहा लोका राजो, देव राजः, चक्र भूपह स्कभूपतिहि निलाद्रिह बद्रीनाथशः, अनन्ता पुरुषोत्तमः ताकारसोधायोह, कल्पतरु, बिमला प्रीति बरदन्हा बलभद्रोह, बासुदेव, माधवो, मधुसुदना दैत्यारिः, कुंडरी काक्षोह, बनमाली बडा प्रियाह, ब्रम्हा बिष्णु, तुषमी बंगश्यो, मुरारिह कृष्ण केशवः श्री राम, सच्चिदानंदोह, गोबिन्द परमेश्वरः बिष्णुुर बिष्णुुर, महा बिष्णुपुर, प्रवर बिशणु महेसरवाहा लोका कर्ता, जगन्नाथो, महीह करतह महजतहह ॥ महर्षि कपिलाचार व्योह, लोका चारिह सुरो हरिह वातमा चा जीबा पालसाचा, सूरह संगसारह पालकह एको मीको मम प्रियो ॥ ब्रम्ह बादि महेश्वरवरहा दुइ भुजस्च चतुर बाहू, सत बाहु सहस्त्रक पद्म पितर बिशालक्षय पद्म गरवा परो हरि पद्म हस्तेहु, देव पालो दैत्यारी दैत्यनाशनः चतुर मुरति, चतुर बाहु शहतुर न न सेवितोह … पद्म हस्तो, चक्र पाणि संख हसतोह, गदाधरह महा बैकुंठबासी चो लक्ष्मी प्रीति करहु सदा ।
