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*अमृत कथा* *🛑 मीरा चरित भाग 4️⃣0️⃣ 🛑* *मीरा के रूप-सौन्दर्य के अतुलनीय भण्डार के द्वार आज शृंगार ने उद्घाटित कर दिये थे। नव बालवधू के रूप में उसे देखकर सभी राजपुरुषों के मन में यह विचार कुमारित होने लगा कि मीरा किसी छोटे-मोटे घर-वर के योग्य नहीं है। सर्वस्व देकर भी किसी बड़े घर में विवाह करके उसका भविष्य उज्ज्वल बनाया जा सके तो हमारे घर मे उसका जन्म लेना सार्थक हो। वीरमदेव जी आज उसके रूप को देखकर चकित रह गये। उन्होंने मन-ही-मन दृढ़ निश्चय किया कि हिन्दुआ सूर्य की पुत्रवधू-पद ही मीरा के लिये उचित स्थान है। 'बेटी! अब तुम अपने संगीत के द्वारा सेवा करो।'-बाबा बिहारी दास जी ने आज्ञा दी। मीरा ने उठकर गुरुचरणों में प्रणाम किया। फिर चारभुजानाथ और दूदाजी आदि बड़ो को प्रणाम करके यथास्थान बैठकर तानपूरा उठाया। उसकी सुकोमल उँगलियाँ कुछ क्षण तारों पर फिसलती रहीं, फिर आलाप लेकर उसने गाना प्रारंभ किया- बसो मेरे नैनन में नंदलाल । मोहिनी मूरत साँवरी सूरत, नैना बने विशाल । अधर सुधारस मुरली राजत उर बैजंती माल ।। छुद्र घंटिका कटि तट शोभित नूपुर सबद रसाल। मीरा प्रभु संतन सुखदायी, भगत बछल गोपाल ।। बाबा बिहारी दास जी सहित दूदाजी चकित एवं प्रसन्न हो उठे। यह पद मीरा का अपना बनाया हुआ था। इस पद को सुनकर दोनों के मुख से एक ही साथ आनन्दातिरेक में अति गद्गद स्वर निकला- 'बेटी!' मीरा ने विनय-संकोचवश अपने नेत्र झुका लिये। प्रणाम करने के लिये उठती हुई मीरा को बाबा बिहारी दास जी ने हाथ बढ़ाकर रोक दिया तो उसने बैठे-बैठे ही हाथ जोड़कर सिर झुकाया। 'एक और।' बाबा बिहारी दास जी ने उमंग में भरकर कहा। मीरा ने आँखें बंद कर ली। अँगूठियों से विभूषित उँगलियाँ तारों पर तैर रही थीं..!! ✍️क्रमशः *🌼🌻श्री कृष्णं वन्दे🌻🌼*

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