
प्रशांत कुमार मिश्रा
6 days ago
रामचरित: उत्तरकाण्ड; दोहा २६. अंगद बचन बिनीत सुनि रघुपति करुना सींव | प्रभु उठाइ उर लायउ सजल नयन राजीव || अर्थात् तुलसीदासजी कहते हैं कि अंगद बार - बार अपने शरण में ही रखने के लिए और घर जाने के लिए न कहने के लिए प्रभु से प्रार्थना करते हुए उनके चरणों में गिर पड़े | अंगद के विनम्र वचन सुनकर करुणा की सीमा प्रभु श्रीरघुनाथजी ने उनको उठा कर हृदय से लगा लिया | प्रभु के नेत्रकमलों में प्रेमाश्रुओं का जल भर आया | प्रभु ने अपने हृदय की माला , वस्त्र और मणि बालि- पुत्र अंगद को पहनाया और बहुत प्रकार से समझाकर उनको बिदा किया | तात्पर्य यह है कि अंगद की तरह सम्पूर्ण समर्पण भाव से प्रभु के चरणकमलों में शरण ले लेने पर करुणानिधान प्रभु अपने भक्त को उठाकर हृदय से लगा लेते हैं | जय जय सीताराम |
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