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🌺 जन्माष्टमी का वह रहस्य — 12,000 दिव्य वर्षों की तपस्या का फल 🌺 जन्माष्टमी की आधी रात जब मथुरा के कारागार में भगवान श्रीकृष्ण का जन्म हुआ, तब यह केवल एक युग की घटना नहीं थी। इसके पीछे एक ऐसा वचन था, जो भगवान विष्णु ने युगों पहले अपने दो भक्तों को दिया था। स्वायंभुव मन्वंतर में सुतपा और उनकी पत्नी पृश्नि ने भगवान विष्णु को पुत्ररूप में पाने की इच्छा से अत्यंत कठिन तपस्या आरंभ की। वर्षा, तेज धूप, शीत और वायु की कठिन परिस्थितियों को सहते हुए दोनों ने भगवान का ध्यान किया। इसी प्रकार उनकी कठोर तपस्या करते-करते 12,000 दिव्य वर्ष बीत गए। उनकी भक्ति और तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान विष्णु उनके सामने प्रकट हुए। उन्होंने वर माँगने को कहा। सुतपा और पृश्नि ने भगवान से अपने जैसा ही पुत्र पाने की इच्छा व्यक्त की। तब भगवान ने उनकी इच्छा स्वीकार की और उनके पुत्ररूप में तीन बार आने का वचन दिया। समय आने पर भगवान विष्णु ने अपना वचन निभाया और सुतपा-पृश्नि के घर पुत्ररूप में पृश्निगर्भ के रूप में जन्म लिया। अगले जन्म में यही सुतपा और पृश्नि कश्यप और अदिति बने। तब भगवान उनके पुत्र उपेन्द्र के रूप में जन्मे। अपने छोटे कद के कारण वे वामन नाम से प्रसिद्ध हुए। लेकिन भगवान का दिया हुआ वचन अभी पूरा नहीं हुआ था। तीसरे जन्म में सुतपा और पृश्नि वसुदेव और देवकी बने। और फिर वह पवित्र रात आई, जिसका इंतजार युगों से था। मथुरा के कारागार में आधी रात के समय देवकी के गर्भ से श्रीकृष्ण का जन्म हुआ। वे साधारण शिशु के रूप में नहीं, बल्कि चतुर्भुज दिव्य स्वरूप में दिखाई दिए। उनके हाथों में शंख, चक्र, गदा और पद्म सुशोभित थे। भगवान ने वसुदेव को गोकुल ले जाने की व्यवस्था बताई। उसी समय नंद की पत्नी यशोदा के घर योगमाया ने कन्या के रूप में जन्म लिया। योगमाया के प्रभाव से कारागार के पहरेदार गहरी निद्रा में सो गए और द्वार खुल गए। वसुदेव श्रीकृष्ण को लेकर गोकुल की ओर चल पड़े। आकाश में बादल बरस रहे थे और तभी अनंत शेष ने अपने फण फैलाकर भगवान को वर्षा से ढक लिया। गोकुल पहुँचकर वसुदेव ने कृष्ण को यशोदा के शयन के पास रख दिया और उनकी नवजात कन्या को लेकर मथुरा लौट आए। जब कंस को कन्या के जन्म का समाचार मिला, वह कारागार में पहुँचा। उसने उस बालिका को शिला पर पटकना चाहा, लेकिन वह उसके हाथ से छूटकर आकाश में चली गई और अष्टभुजा देवी के रूप में प्रकट हुई। देवी ने कंस को बता दिया कि जिससे उसे भय था, वह जन्म ले चुका है और कहीं सुरक्षित पहुँच चुका है। इस प्रकार जन्माष्टमी की उस रात केवल श्रीकृष्ण का जन्म नहीं हुआ—सुतपा और पृश्नि से शुरू हुई एक युगों पुरानी अभिलाषा का तीसरा और अंतिम चरण भी पूरा हुआ। भगवान ने अपना वचन निभाया और तीसरी बार अपने उन्हीं भक्तों के पुत्र बने।

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