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Rama Devi Sahu

140 days ago

#बोधकथा || सच्चा सन्त || द्वारकाधीश मन्दिरकी पहली सीढ़ीके दाहिने किनारेपर वर्षोंसे एक दृष्टिहीन भिक्षुक टाट बिछाकर बैठा रहता था। मन्दिरमें आने-जानेवाले श्रद्धालु उसके टाटपर कभी आठ आने या एक रुपया डाल देते, जिसे वह हाथमें टटोलकर उठा लेता और टाटके नीचे रख देता। कुछ लोग उसके हाथपर भगवान्‌का प्रसाद भी रख देते थे। पासहीमें हलवाईकी दूकान थी। सर्दीके दिनोंमें रातको वह हलवाईकी भट्टीके सामनेकी गर्म जमीनपर पड़कर सो जाया करता था। एक दिन उसे अपने आसपास कुछ हलचल लगी और बहुत से लोगोंके पैरोंकी आहटका आभास हुआ। उसने कहा— 'आज क्या हो रहा है..?....' एक युवक बोला— 'भगवान्‌के अन्नकूटके लिये चन्दा इकट्ठा किया जा रहा है। उसने जल्दीसे टाटके नीचे टटोला और सारे पैसे उठाकर युवकके हाथमें दे दिये। उसमें सौ रुपयेके तीन नोट थे और बाकी सब सिक्के थे। 'बाबा ! आपने तो सारे पैसे दे दिये कुछ तो कलके लिये भी रख लेते।' 'जिसने दिये हैं, उसीको अर्पण कर रहा हूँ। कलका हिसाब भी वही कर देगा।' यह कहकर सन्त पुनः ध्यानमग्न हो गये। 🌿🍂☘️🌿🍂☘️🌿🍂☘️🌿🍂☘️🌿🍂☘️🌿 ❀༺꧁||🙏जय माँ🙏||꧂༻

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Comments (1)

Bajra Singh Chouhan

Bajra Singh Chouhan

May 26, 2026

,🌹🙏🏻🙏🏻