
प्रभा त्रिपाठी
441 days ago
आज के विचार “श्रीकृष्णसखा ‘मधुमंगल’ की आत्मकथा-101” ( कालीदह पे ) 14, 6, 2025 ************************************** गतांक ते आगै कौ प्रसंग - मैं मधुमंगल ....... खेल चल रह्यो है , खूब जोर शोर ते चल रह्यो है । कन्हैया कभी जीत रहे हैं तौ कभी हार रहे हैं ...हार जामें तौ खिसिया जामें ...जीतवे में तौ बस विजय उत्सव आरम्भ । अब सब थक गए है ....तौ बैठ गए ....कन्हैया पहले बैठ्यौ फिर हम सब बैठे । सबके अंग स्वेद ते भींग रहे है । शीतल पवन ने कछु राहत दई । लेकिन जे का भयौ ! गैयन ने दूर मैदान में कोमल हरी हरी दूब देखी ....तौ सब भगीं वाही ओर । अब सखान ने देख्यो तौ कन्हैया ते बोले ...लाला ! अपनी गैया तौ भाग रहीं हैं ....कन्हैया ने देखी लेकिन उठे नही...बैठे बैठे ही पूछवे लगे ....क्यों भाग रहीं हैं ? का इनकूँ कछू दीख गयौ ? एक ने उचक के देख्यो तौ बोलो ...दूर में तौ कोई निर्जन मैदान है ......वहाँ अच्छी दूब हैं ....वही चरवे जाय रही हैं ......तभी दो सखा अब गैयन के पीछे भागे .....लेकिन बाबरी सी भाग रहीं गैया । अब तौ सारे सखा गैयान के पीछे भागे ....लेकिन आज कन्हैया नही गए ....जे पहली बार हो कि गैयन में संकट पड़ रह्यो है और गोपाल निश्चिन्त है । लीला है गोपाल की ....लीला ऐसे ही तौ बनै । सब चले गए गैयान के पीछे ...किन्तु मैं नही गयौ । मैं वहीं रह्यो । कन्हैया ने मोते बहुत कही ....मधुमंगल ! तू भी जा । लेकिन मेरौ मन नही मान्यो ..मैं वहीं रह्यो अपने कन्हैया के पास । अब तौ देर है गयी ...अभी तक कोई नही आए ? जब अधिक विलम्ब है गयौ गैयन कूँ लौटवे में ......तौ कन्हैया मोते बोल्यो । मैंने हूँ कही ....पतौ नाँय कहाँ गए ? मैं हूँ देख रो ...वृक्षन में चढ़के हूँ मैंने देखी .....लेकिन दूर दूर तक नही है । कन्हैया की चिन्ता अब बढ़ती जा रही । कौन कहे ....मेरे कन्हैया कूँ चिन्ता नही होवै है ....होवै ...हमते अधिक चिन्ता बाकूँ होवै .....बाकूँ हमारी चिन्ता है ....हम दीन हीनन की चिन्ता है ....गोपाल नाम ऐसे ही तौ नही है । मधुमंगल ! चल देख के आमें । कन्हैया ने मोते कही ...और हम दोनों वन में घूमते भए खोज रहे अपने सखा और गैयन कूँ । बहुत चल लिए लेकिन अभी तक कोई दिखाई नही दियौ ? अरे एकाध बालक या गैया हूँ दीख जातीं ? लेकिन नही हैं । अब हम आगे बढ़ रहे हैं.....तभी मेरी दृष्टि पड़ी सामने के मैदान में ....हरौ मैदान . हरी हरी दूब .....और सामने यमुना जी । नही , जे यमुना जी की मूल धारा नही है ....यमुना कौ जल ...लहरन तै उछलके या गड्डे में भर जावे ...गड्डे कौ मतलब कोई छोटौ मत समझियौं ....जे बहुत बड़ौ गड्डों हो ..और आज कौ नही बरसन पुरानौं । याते कहें ...हृद । आश्चर्य मधुमंगल ! यहाँ दूर दूर तक कोई जीव जन्तु नही है । कन्हैया या स्थान कूँ बड़े ध्यान तै देख रहे हैं । फिर थोड़ी देर बाद बोले ...”और देखौ तौ , यहाँ कोई वृक्ष हूँ नही हैं”.....बस एक ही वृक्ष है कदम्ब कौ ....बु हूँ अकेलौ ठाडौ है । लेकिन जे सब देख के कन्हैया फिर बोले - मोकूँ चिन्ता लग रही है ....कहाँ हैं मेरे सखा और मेरी गैया ? कन्हैया कूँ चिन्तित देखके मोकूँ हूँ चिन्ता सतायवै लगी । मैं हूँ भग्यौ बा मैदान में .....लेकिन कोई नही दीखौ । तभी कन्हैया जोर ते चिल्लाए ....मधुमंगल ! सुनते ही मैं कन्हैया की ओर भग्यौ .... अरे ! ये क्या ? मैं भीतर तक काँप गयौ .....सारी गैया मरी पड़ीं हीं और सारे ग्वाल सखा मृत पड़े है । मैं वहाँ जब पहुँच्यौ तौ वहाँ कौ भयावह दृष्य देखके मैं काँप गयो हो । मैं रोयवे लग्यौ ....लेकिन कन्हैया तौ यमुना में जाय के ध्यान ते कछु देख रो ..... जल कूँ देख रह्यो हो कन्हैया ......कन्हैया ! जल में उबाल है ....जैसे भीतर ते आग की भट्टी चल रही हो ........”कालिय ने या हृद कूँ अपनौं बनाय लियौ है” कन्हैया गम्भीर है कै बोले । कौन कालिय ? मैंने पूछी तौ कन्हैया बोले ....पक्षीराज गरुण कौ पुरानौं शत्रु । लेकिन हमते कहाँ दुश्मनी है या कालिय की ? कन्हैया बस हृद कूँ देख रहे हैं
Comments (3)

विद्या सागर शुक्ल
Jun 16, 2025
जय श्री राधे कृष्णा

Deepak karki
Jun 16, 2025
🙏Jai shree radhe krishna jai shree radhe radhe 🙏

Rama Devi Sahu
Jun 15, 2025
Radhey Radhey Jii 🙏🌹🌹
