
Rama Devi Sahu
1 day ago
शास्त्रों के अनुसार, जब भगवान विष्णु ने कृष्ण रूप में अवतार लिया, तो कैलाश पर बैठे महादेव समाधि में थे। जैसे ही कृष्ण का जन्म हुआ, महादेव की समाधि टूट गई। वे समझ गए कि उनके आराध्य धरती पर आ चुके हैं। महादेव के मन में अपने प्रभु के बाल-रूप को निहारने की ऐसी तड़प जगी कि वे एक पल भी रुक न सके। शिव जी सोचने लगे कि अगर वे अपने असली रूप (भस्म, नाग और मुंडमाला) में गए, तो ब्रजवासी और स्वयं माता यशोदा डर जाएंगी। उन्होंने एक 'जोगी' (साधु) का वेश बनाया, हाथ में सिंगी (बाद्य यंत्र) ली और अलख जगाते हुए नंद बाबा के द्वार पर पहुँच गए। जब यशोदा जी बाहर आईं, तो उन्होंने एक अजीब से साधु को देखा जिनकी आँखों में तेज था। शिव जी ने भिक्षा नहीं मांगी, बल्कि कहा— "मैया, मुझे अपने लाला के दर्शन करा दे।" यशोदा जी डर गईं। उन्होंने सोचा कि इस साधु का रूप इतना विचित्र है, कहीं उनके लल्ला को नज़र न लग जाए या वह डर कर रोने न लगे। उन्होंने साफ मना कर दिया और कहा— "बाबा, तुम जो मांगो वो दे दूँगी, पर लाला को बाहर नहीं लाऊँगी।" महादेव निराश होकर नंद भवन के पास ही 'नंदीश्वर महादेव' (आज भी गोकुल में यह स्थान है) के रूप में बैठ गए। इधर, अंतर्यामी कृष्ण समझ गए कि उनका भक्त द्वार से खाली हाथ जा रहा है। उन्होंने ज़ोर-ज़ोर से रोना शुरू कर दिया। मैया ने बहुत कोशिश की, लोरी सुनाई, माखन दिया, पर कृष्ण चुप ही नहीं हुए। तभी एक सखी ने कहा— "मैया, शायद उस साधु को खाली हाथ लौटाने का दोष लगा है, उसे बुलाकर लाओ।" हार मानकर यशोदा जी ने महादेव को बुलाया। जैसे ही महादेव ने कृष्ण को गोद में लिया, कृष्ण चुप हो गए और खिलखिलाकर हंसने लगे। यही वह क्षण था जब 'वैराग्य' (शिव) का 'प्रेम' (कृष्ण) से मिलन हुआ। कथा के कुछ रोचक तथ्य असीतश्वर महादेव: कहा जाता है कि शिव जी जिस स्थान पर बैठे थे, वहां आज भी मंदिर है। गोपेश्वर महादेव: इसी प्रेम के वशीभूत होकर बाद में शिव जी ने कृष्ण की रासलीला देखने के लिए 'गोपी' का रूप भी धारण किया था, जिन्हें आज वृंदावन में 'गोपेश्वर महादेव' के रूप में पूजा जाता है। यह कहानी सिखाती है कि भगवान के लिए कोई छोटा या बड़ा नहीं होता। एक भक्त (शिव) और भगवान (कृष्ण) के बीच केवल प्रेम का नाता होता है।
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