
Rama Devi Sahu
444 days ago
🙏‼️ Hari Om Tat Sat ‼️🙏 🙏🌹 Sabhi ko Suprabhat 🌹🙏 🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹 गुणों के आधार पर भक्तों के प्रकार हम सभी जानते हैं कि गुण तीन प्रकार के - सत्त्व , रज और तम - होते हैं। इन तीन गुणों के आधार पर मनुष्य भी तीन प्रकार के होते हैं - सात्त्विक , राजस एवं तामस। मनुष्य जो भी करता है, उसका कृत्य इन गुणों से प्रभावित होता है। सात्त्विक व्यक्ति जब भक्ति करेगा, तो उसमें सत्त्व गुण की प्रबलता होगी। राजस व्यक्ति जब भक्ति करेगा , तब उसमें रजोगुण प्रबल रहेगा। तामस व्यक्ति जब भक्ति करेगा , तो उसमें तामसी गुणों का समाविष्ट होगा ही। तीनों प्रकार के अलग-अलग गुणों से युक्त व्यक्ति जब भक्ति करता है , तो उसमें उस गुण के बाहुल्य के अनुरूप उसमें आकांक्षा रहती है। सात्त्विक व्यक्ति सात्त्विक भक्ति करता है , राजस व्यक्ति राजस भक्ति करता है तथा तामस व्यक्ति तामस भक्ति करता है। इन तीनों प्रकार की भक्ति में भगवान से आकांक्षा (मांग) रहती है। मांग की गुणवत्ता में केवल अंतर होता है। सात्त्विक भक्ति - जब व्यक्ति अपने पापों के विमोचन के लिए , भव-सागर से पार होने के लिए तथा अंधकार से मुक्त होने के लिए भक्ति करता है, तब ऐसी भक्ति " सात्त्विक भक्ति " कहलाती है। तब उसकी मांग प्रभु से होती है - ' असतो मा सद्गमय ' अर्थात् असत्य से सत्य की तरफ ले चलो। ' तमसो मा ज्योतिर्गमय ' अर्थात् अंधकार से प्रकाश की ओर ले चलो। ' मृत्योर्मा अमृतं गमय ' अर्थात् मृत्यु से मुझे अमृत की तरफ ले चलो। मनुष्य जहां तक कल्पना कर सकता है , उसकी यह अंतिम ऊंचाई है। सात्त्विकी भक्ति के अंतर्गत सत्पुरुषों की आकांक्षा पारलौकिक होती है। राजस भक्ति - यह भक्ति सात्त्विक भक्ति के नीचले पायदान पर है। रजोगुण मिश्रित इस राजस भक्ति में व्यक्ति की आकांक्षा का स्वरूप पारलौकिक से परिवर्तित होकर लौकिक हो जाता है। यश-कीर्ति प्राप्त हो एवं धन मिले , पद मिले - इस प्रकार की आकांक्षा इसमें होती है। " मैं कुछ हूं " - यह विशिष्टता समाज को दिखाने के लिए एवं अपने अहंकार की तृप्ति के लिए जो भक्ति की जाती है , वह राजसी भक्ति है। अधिकतम लोगों की गणना इसी श्रेणी में होती है। इस भक्ति के अंतर्गत कंचन एवं कीर्ति की कामना की जाती है। तामस भक्ति - यह भक्ति सबसे निम्न कोटि की होती है। तामस व्यक्ति न तो पारलौकिक और न ही लौकिक उन्नति में विश्वास रखता है। वह अपनी उन्नति के बजाय दूसरे की अवनति में ज्यादा सुख महसूस करता है। तामसी भक्त ईर्ष्यालु होता है। वह चाहता है कि किसी खुशहाल परिवार पर दु:ख का पहाड़ टूट पड़े तथा कोई स्वस्थ आदमी मर जाए। अपने को मिटाकर भी दूसरे को मिटाने में इसे सुख मिलता है। सरल शब्दों में कहें , तो दूसरों को कष्ट देने के लिए तामस व्यक्ति द्वारा जो भक्ति की जाती है , वह तामसी भक्ति होती है। एक तामस भक्त ने अपनी तपश्चर्या से भगवान शंकर को प्रसन्न कर लिया। भगवान ने उसे वर मांगने को कहा। भगवान उस तामस भक्त के स्वभाव को जानते थे , अतः उन्होंने कहा कि तुम जो भी मांगोगे , उसका दुगना तुम्हारे पड़ोसी को प्राप्त होगा। भगवान ने ऐसा इसलिए कहा कि इससे तामस भक्त के अंत:करण से ईर्ष्या-द्वेष का भाव नष्ट हो जाए तथा दूसरे की खुशहाली में वह खुशी का अनुभव कर सके। कुछ देर विचार करने के पश्चात् तामस भक्त ने कहा - भगवन् ! मेरी एक आंख फूट जाए तथा एक पैर टूट जाए। ऐसा इसलिए कहा ताकि पड़ोसी के दोनों आंख फूट जाए तथा दोनों पैर टूट जाए। ऐसे व्यक्ति को क्या भक्त कहा जा सकता है ? उपर्युक्त तीनों प्रकार के भक्तों से ऊपर उठकर जो प्रभु से कुछ नहीं मांगता बल्कि कृतज्ञता प्रकट करता है , वही प्रभु को कुछ देने की सोच सकता है। हम सभी केवल और केवल लेते ही हैं , प्रभु को देते कहां हैं ? जिसके भीतर प्रभु को सब कुछ अर्पण करने की योग्यता आ जाए , वैसे भक्तों के लिए " पत्रं पुष्पं फलं तोयं " श्लोक कहा गया है। अगले अंक से इस श्लोक का निहितार्थ लिखा जाएगा। मिथिलेश ओझा की ओर से आपको नमन एवं वंदन। ।। योगेश्वर भगवान श्री कृष्ण की जय ।।
Comments (1)

Deepak karki
Jun 12, 2025
om namah bhagvate Basu dev ji ki jai ho
