
Rama Devi Sahu
179 days ago
दक्षिण भारत के एक धर्मात्मा राजा सत्यव्रत (जो आगे चलकर वैवस्वत मनु कहलाए) एक दिन नदी में तर्पण कर रहे थे। तभी उनकी अंजलि में एक छोटी सी मछली आई। मछली ने प्रार्थना की — “राजन, मुझे बड़ी मछलियों से बचाइए।” राजा ने दया करके उसे अपने कमंडल में रखा। लेकिन वह मछली तेजी से बढ़ने लगी — कमंडल से घड़ा, घड़े से तालाब, तालाब से झील और अंत में समुद्र भी उसके लिए छोटा पड़ गया। तब राजा समझ गए कि यह कोई साधारण जीव नहीं है। मछली ने अपना दिव्य रूप प्रकट किया — वह स्वयं भगवान विष्णु थे। भगवान ने राजा को बताया कि शीघ्र ही महाप्रलय आने वाली है, जिसमें पृथ्वी जलमग्न हो जाएगी। उन्होंने निर्देश दिया कि: एक विशाल नौका का निर्माण करें। सभी वनस्पतियों के बीज सुरक्षित रखें। श्रेष्ठ जीवों को संरक्षित करें। सप्तऋषियों को साथ लें, ताकि ज्ञान परंपरा बनी रहे। जब प्रलय आई और पृथ्वी जल से भर गई, तब भगवान विष्णु एक विशाल मत्स्य (मछली) रूप में प्रकट हुए। उनके माथे पर एक दिव्य सींग था। राजा ने वासुकी नाग को रस्सी की तरह प्रयोग कर नौका को मत्स्य भगवान के सींग से बाँध दिया। भगवान मत्स्य उस नौका को सुरक्षित रूप से खींचते रहे। प्रलय के दौरान भगवान ने राजा और सप्तऋषियों को सृष्टि, धर्म, ब्रह्मांड विज्ञान और जीवन के सिद्धांतों का उपदेश दिया। यही ज्ञान आगे चलकर मत्स्य पुराण के रूप में प्रसिद्ध हुआ। इस कथा का दार्शनिक अर्थ प्रलय केवल भौतिक विनाश नहीं, बल्कि अधर्म और अज्ञान का प्रतीक भी है। नौका धर्म और सदाचार का प्रतीक है। सप्तऋषि ज्ञान और परंपरा के रक्षक हैं। मनु मानव जाति के आदिपुरुष माने जाते हैं। “मनु” से ही “मानव” शब्द की उत्पत्ति मानी जाती है।
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