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Rama Devi Sahu

171 days ago

सच्ची भेंट: पुरी के जगन्नाथ और एक नन्ही भक्त नीलाचल की पावन भूमि, जहाँ समुद्र की लहरें जगन्नाथ के चरणों को पखारती हैं, वहाँ हर शाम भक्ति का एक अनूठा संगम होता है। उसी भीड़ में एक नन्ही भक्त भी थी, जिसके पास न तो रेशमी वस्त्र थे और न ही छप्पन भोग लगाने के पैसे। जब वह बड़े-बड़े सेठों को सोने के थाल और सुगंधित फूलों के ढेर ले जाते देखती, तो उसका मन भर आता। एक शाम, मंदिर की दीवटों की टिमटिमाती रोशनी में उसने अपनी आँखें मूँद लीं और सुबकते हुए धीरे से कहा: > "हे प्रभु! दुनिया आपके लिए अनमोल रत्न लाती है, पर मेरी हथेलियाँ खाली हैं। क्या मेरी साधारण सी पुकार आप तक पहुँचेगी?" > उसने कोई उपहार नहीं चढ़ाया, बस अपना अटूट विश्वास और निस्वार्थ प्रेम उनके चरणों में रख दिया। तभी एक चमत्कार हुआ। पुजारियों ने देखा कि भगवान जगन्नाथ की विशाल माला उनके गले से थोड़ी नीचे सरक आई थी—मानो 'ब्रह्मांड के स्वामी' उस छोटी सी बच्ची की करुण पुकार सुनने के लिए खुद नीचे झुक गए हों। मंदिर के अनुभवी पुजारियों ने मुस्कुराते हुए कहा, "भगवान को छप्पन भोग नहीं, भाव का भूखा कहा जाता है। आज इस बच्ची की निश्छल प्रार्थना ने सोने के आभूषणों को भी फीका कर दिया।" उस दिन उस लड़की को समझ आ गया कि जिसके साथ जगन्नाथ हैं, वह कभी दरिद्र नहीं हो सकता। श्रीमद्भागवतम् का दिव्य संदेश इस कहानी का सार इस श्लोक में छिपा है: इसका गहरा अर्थ: मनुष्य का परम कर्तव्य वही है जिससे भगवान की भक्ति प्राप्त हो। और वह भक्ति कैसी हो? * अहैतुकी: जिसमें कोई स्वार्थ या लालच न हो। * अप्रतिहता: जिसे दुनिया की कोई भी बाधा रोक न सके। जब ऐसी निस्वार्थ भक्ति जगती है, तब आत्मा को वह परम संतोष मिलता है जो दुनिया की कोई भी संपत्ति नहीं दे सकती।

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