
Rama Devi Sahu
11 hours ago
भगवान कृष्ण का नाम दामोदर कैसे पड़ा : श्री कृष्णा जन्माष्टमी स्पेशल कथा: दीपावली का पावन दिन था। माता यशोदा ने अपनी सभी दासियों को दूसरे कार्यों में लगा दिया और कन्हैया के लिए अपने हाथों से श्रेष्ठ माखन निकालने के लिए स्वयं दही मथने लगीं कन्हैया जागकर आए और भूख का बहाना बनाकर मथानी पकड़ ली तथा मैया का स्तनपान करने लगे तभी चूल्हे पर चढ़ाया हुआ दूध उबलने लगा। यशोदा जी ने कन्हैया को गोद से उतारा और दूध बचाने के लिए दौड़ीं बालकृष्ण को क्रोध आ गया कि मैया ने दूध के लिए उन्हें छोड़ दिया। उन्होंने पास रखे सिलबट्टे के पत्थर से दही की मटकी फोड़ दी इसके बाद वे दूसरे कमरे में जाकर एक उल्टे रखे ओखल (उलूखल) पर चढ़ गए और छींके पर टंगे माखन को उतारकर स्वयं खाने लगे और बंदरों को खिलाने लगे जब मैया लौटीं और बिखरा हुआ दही देखा, तो समझ गईं कि यह लाला की ही करतूत है। वे हाथ में एक छोटी छड़ी लेकर दबे पांव पीछे पहुंचीं। कन्हैया ने जब हाथ में छड़ी लिए मैया को देखा, तो वे ओखल से कूदकर भयभीत होने का अभिनय करते हुए भागने लगे योगिराज और बड़े-बड़े तपस्वियों के ध्यान में भी न आने वाले परब्रह्म आज एक गोपी के डर से नंगे पांव भाग रहे थे यशोदा मैया उनके पीछे-पीछे दौड़ीं। भागते-भागते मैया थक गईं, उनके जूड़े से फूल गिरने लगे और पसीना बहने लगा प्रभु ने देखा कि मैया अत्यंत थक गई हैं, तो वे स्वयं रुक गए और मैया ने उन्हें पकड़ लिया मैया ने छड़ी फेंक दी और सोचा कि चंचल कन्हैया को थोड़ी देर के लिए आंगन में रखे भारी काठ के ओखल से बांध दिया जाए, ताकि वे कहीं भाग न सकें। यशोदा जी ने रस्सी ली और कन्हैया के पेट को ओखल से बांधने लगीं। किंतु जैसे ही उन्होंने गांठ लगानी चाही, रस्सी दो अंगुल छोटी पड़ गई मैया ने घर से दूसरी रस्सी लाकर जोड़ी, किंतु वह भी दो अंगुल छोटी पड़ गई उन्होंने घर की सारी रस्सियां जोड़ डालीं, फिर भी हर बार रस्सी दो अंगुल ही छोटी रहती थी गोकुल की गोपियां यह देखकर हंसने लगीं और यशोदा जी पसीने से तर-बतर होकर विस्मित रह गईं रस्सी का दो अंगुल छोटा रह गया जब भगवान ने देखा कि माता पूरी तरह थक चुकी हैं और उनकी निष्काम प्रीति अनन्य है, तो वे अपनी कृपा से स्वयं उस छोटी सी रस्सी में बंध गए। यशोदा मैया कन्हैया को ओखल से बांधकर घर के भीतर चली गईं। बालकृष्ण ने सोचा कि देवर्षि नारद के वचनों को सत्य करने और नलकूबर व मणिग्रीव का उद्धार करने का समय आ गया है। वे घुटनों के बल चलते हुए उस भारी ओखल को घसीटने लगे। आंगन से घिसटते हुए वे उन दोनों विशाल यमलार्जुन वृक्षों के बीच पहुंचे दोनों वृक्ष इतने पास थे कि कन्हैया तो उनके बीच से सरक कर निकल गए, किंतु वह विशाल ओखल दोनों तनों के बीच तिरछा होकर अटक गया नन्हे कृष्ण ने रस्सी के सहारे थोड़ा सा जोर लगाया। प्रभु का एक हल्का सा खिंचाव होते ही वे दोनों गगनचुंबी, विशाल वृक्ष भयंकर गड़गड़ाहट के साथ जड़ सहित उखड़कर धरती पर आ गिरे। वृक्षों के गिरते ही उनमें से दो अत्यंत तेजस्वी, देदीप्यमान दिव्य पुरुष (नलकूबर और मणिग्रीव) प्रकट हुए उनके शरीर से सूर्य जैसा प्रकाश निकल रहा था उन्होंने नतमस्तक होकर हाथ जोड़े और भगवान श्रीकृष्ण की स्तुति की: "हे प्रभो! हमारे नेत्र सदा आपके दर्शन करें, हमारे कान आपकी कथाएं सुनें, हमारे हाथ आपकी सेवा करें और हमारा सिर आपके चरणों में झुका रहे। देवर्षि नारद के शाप रूपी अनुग्रह से ही आज हमें आपका साक्षात दर्शन प्राप्त हुआ है भगवान ने उन्हें अपनी भक्ति का वरदान दिया और वे दोनों उत्तर दिशा (अलकापुरी) की ओर प्रस्थान कर गए वृक्षों के गिरने का वज्रपात जैसा भयंकर शब्द सुनकर नंदबाबा और सभी गोकुलवासी दौड़े आए। उन्होंने देखा कि दो विशाल वृक्ष गिरे पड़े हैं और उनके बीच में ओखल से बंधा नन्हा कन्हैया शांत भाव से मुस्कुरा रहा है। नंदबाबा ने शीघ्रता से कन्हैया के बंधन खोले और उन्हें छाती से लगाकर बार-बार चूमा। इस लीला के कारण ही भगवान का एक प्रसिद्ध नाम 'दामोदर' पड़ा (दाम = रस्सी, उदर = पेट, अर्थात जिनके पेट को रस्सी से बांधा गया)। पूर्वजन्म में वे धन के देवता कुबेर के दो पुत्र थे—नलकूबर और मणिग्रीव धन और रूप के घमंड में चूर होकर वे दोनों मंदाकिनी नदी के तट पर अप्सराओं के साथ मदिरापान कर निर्वस्त्र होकर जल-क्रीड़ा कर रहे थे उसी मार्ग से देवर्षि नारद निकले। अप्सराओं ने तो लज्जावश वस्त्र पहन लिए, किंतु मदिरा के नशे में धुत दोनों भाइयों ने नारद जी की उपस्थिति की उपेक्षा की और नग्न ही खड़े रहे। नारद जी ने सोचा कि इनका धन का घमंड वृक्ष की तरह जड़ हो गया है, इसलिए इन्हें वृक्ष बनना चाहिए ताकि जड़ता टूटे। उन्हों

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