
Rama Devi Sahu
124 days ago
रोना हो तो कृष्ण के लिए ही रोयें..... यह अभागा, पापी मन धन दौलत के लिए तो रोता पिटता है लेकिन भगवान् अपने हैं, फिर भी आज तक इसके लिए रोता नहीं है। क्या करें ?" "रोना नहीं आता तो एक बार झूठमूठ में ही रो ले।" झूठा संसार सच्चा आकर्षण पैदा करके चौरासी के चक्कर में डाल देता है तो भगवान के लिए झूठमूठ में रोना सच्चा विरह पैदा करके हृदय में प्रेमाभक्ति भी जगा देता है। अनुराग इस भावना का नाम है कि "भगवान हमसे बड़ा स्नेह करते हैं, हम पर बड़ी भारी कृपा रखते हैं। हम उनको नहीं देखते पर वे हमको देखते रहते हैं। हम उनको भूल जाते हैं पर वे हमको नहीं भूलते। हमने उनसे नाता- रिश्ता तोड़ लिया है पर उन्होंने हमसे अपना नाता- रिश्ता नहीं तोड़ा है। हम उनके प्रति कृतघ्न हैं पर हमारे ऊपर उनके उपकारों की सीमा नहीं है। भगवान हमारी कृतघ्नता के बावजूद हमसे प्रेम करते हैं, हमको अपनी गोद में रखते हैं, हमको देखते रहते हैं, हमारा पालन-पोषण करते रहते हैं।' इस प्रकार की भावना ही प्रेम का मूल है। एक बार दिल की गहराई से पुकारोः 'हे नाथ !.... हे मुरलीधर !... हे कृष्ण !..... टुकुर-टुकुर दिल के झरोखे से देखने वाले श्याम सुंदर !.... हे प्रभु !... ओ कान्हा !... मेरे गिरधर !.... प्यारे मोहन!..... तेरी प्रीति, तेरी भक्ति दे..... हम तो तुमसे से ही माँगेंगे, क्या बाजार से लेंगे ? कैसे भी उन्हें पुकारो। वे बड़े दयालु हैं। वे जरूर अपनी करूणा का एहसास करायेंगे। तुलसी अपने राम को रीझ भजो या खीज। भूमि फैंके उगेंगे, उलटे सीधे बीज। राधे राधे


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