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Rama Devi Sahu

11 days ago

कैसा हो जब आप पैदा हों और जन्म लेते ही जिंदगी आपका साथ छोड़ने लगे? कैसा हो कि जिस उम्र में बच्चे मां की गोद में पलते हैं, उस उम्र में आपके सिर से माता-पिता का साया उठ जाए? कैसा हो कि जिंदगी आपको बहुत कुछ देने से पहले ही आपसे बहुत कुछ छीन ले? और फिर किसी दिन आपकी जिंदगी में एक ऐसा इंसान आए, जिसके मिलने के बाद आपको लगे कि शायद अब जिंदगी अधूरी नहीं है? कुछ ऐसा ही था उस बालक रामबोला का जीवन, जिसे दुनिया आगे चलकर गोस्वामी तुलसीदास के नाम से जानने वाली थी। कल 19 अगस्त को बाबा गोस्वामी तुलसीदास जी की जयंती है। इस पावन अवसर पर उस महान संत, कवि और रामभक्त के चरणों में कोटि-कोटि नमन और आप सभी रामभक्तों को तुलसीदास जयंती की हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएं। लेकिन आज तुलसीदास जी को केवल एक महान कवि या रामचरितमानस के रचयिता के रूप में याद करने के बजाय, आइए उनके जीवन को एक साधारण मनुष्य की तरह समझने की कोशिश करते हैं। क्योंकि संत बनने से पहले वे भी एक मनुष्य थे। उनके जीवन में भी प्रेम था, मोह था, लगाव था, बेचैनी थी और ऐसी कमजोरियां थीं, जो शायद हम सबके भीतर कहीं न कहीं मौजूद हैं। तुलसीदास जी के जन्म और बाल्यकाल को लेकर इतिहास, जनश्रुति और अलग-अलग परंपराओं में कई मत मिलते हैं। राजापुर को उनकी जन्मभूमि मानने की परंपरा सबसे प्रचलित है और उनके जन्म को श्रावण शुक्ल सप्तमी से जोड़ा जाता है। उनके बचपन का नाम रामबोला बताया जाता है। बचपन में ही माता-पिता से अलगाव और जीवन के संघर्षों की कथा उनके जीवन-चरित का महत्वपूर्ण हिस्सा बन गई। अब जरा सोचिए उस बच्चे के मन को, जिसे जीवन में अपनापन बहुत कम मिला हो। ऐसे व्यक्ति को जब कोई अपना मिलता है, तो वह केवल रिश्ता नहीं बनाता, वह उस रिश्ते में अपना पूरा संसार रख देता है। रामबोला के जीवन में वह संसार बनीं रत्नावली। विवाह हुआ। घर मिला। साथ मिला। एक ऐसा व्यक्ति मिला जिसके साथ बैठकर आदमी अपने दुख भूल सकता है। और शायद यही वह जगह है जहां हम तुलसीदास को संत की तरह नहीं, अपने जैसा एक साधारण मनुष्य समझ सकते हैं। क्योंकि प्रेम में पड़ना कोई अपराध नहीं है। अपनों से प्रेम करना कोई कमजोरी नहीं है। लेकिन कभी-कभी प्रेम और मोह के बीच की वह महीन रेखा दिखाई नहीं देती, जो बाद में जीवन का सबसे बड़ा सबक बन जाती है। रामबोला का रत्नावली के प्रति प्रेम धीरे-धीरे इतना गहरा हो गया कि पत्नी केवल पत्नी नहीं रहीं, उनके जीवन का केंद्र बन गईं। और फिर एक दिन रत्नावली मायके चली गईं। कारण कोई बहुत बड़ा नहीं था। परिवार का सामान्य काम था। लेकिन जिस व्यक्ति की दुनिया किसी एक व्यक्ति के इर्द-गिर्द घूमने लगी हो, उसके लिए दूरी की छोटी-सी घड़ी भी बहुत बड़ी हो जाती है। दिन बीता। फिर शाम हुई। फिर रात। और रात के साथ बेचैनी बढ़ती गई। सोचिए उस समय को। न मोबाइल था, न फोन। न यह पता कि वह कैसी हैं। बस मन में एक ही बात - उनसे मिलना है। आखिर आधी रात के बाद रामबोला घर से निकल पड़े अपनी ससुराल महेवा के लिए अपने घर राजापुर से। बाहर अंधेरा था। रास्ता कठिन था। सामने उफनती नदी थी। लेकिन मोह में डूबे आदमी को रास्ते की कठिनाई कहां दिखाई देती है? कहते हैं कि उन्होंने रात में नदी पार की। नदी में जो मिला, उसे सहारा बनाकर आगे बढ़ गए। फिर ससुराल पहुँचे तो घर के भीतर जाने का रास्ता नहीं मिला। दीवार से कुछ लटकता दिखाई दिया। उन्होंने उसे रस्सी समझ लिया। पकड़ा और ऊपर चढ़ गए। बाद में पता चला कि जिसे रस्सी समझकर वे ऊपर चढ़े थे, वह साँप था। यही तो मोह की ताकत है। जिसे होश में आदमी देखकर पीछे हट जाए, मोह में वही आदमी उसे रास्ता समझकर पकड़ लेता है। लेकिन कहानी का सबसे बड़ा मोड़ अभी बाकी था। रत्नावली ने जब अपने पति को उस हालत में देखा तो शायद उनके सामने केवल एक पति नहीं था। उनके सामने एक ऐसा मनुष्य था, जो प्रेम करते-करते अपने विवेक की सीमा पार कर चुका था। उन्होंने उन्हें अपमानित करने के लिए नहीं, जगाने के लिए शब्द कहे। अस्थि चर्म मय देह यह, ता सों ऐसी प्रीति। नेकु जो होती राम से, तो काहे भव-भीत॥ अर्थात - यह शरीर तो हड्डी और चमड़े से बना हुआ नश्वर शरीर है। इससे तुम्हें इतनी प्रीति है। यदि इतनी ही प्रीति श्रीराम से होती, तो फिर संसार के भय से क्यों डरते? बस। कभी-कभी जिंदगी बदलने के लिए कोई लंबा प्रवचन न

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Comments (2)

Rama Devi Sahu

Rama Devi Sahu

Aug 19, 2026

🙏🏹 Jai Shree Ram 🏹 Jai Siya Ram 🏹🙏 Goswami Tulsidas Ji ki Janam Divas ki Hardik Shubhkamnaye ke Sath Suprabhat Ji 🙏🌹🌹

Dilip

Dilip

Aug 19, 2026

जय श्री राम 🌹🙏