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*महामृत्युंजय मंत्र वेदान्तिक अर्थ सहित* *ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्।* *उर्वारुकमिव बन्धनान्मृत्योर्मुक्षीय मामृतात्॥* *- महर्षि मार्कण्डेय, ऋग्वेद 7.59.12* *भावार्थ:* हम त्रिनेत्रधारी, जो सर्वत्र व्याप्त है, और सत्य को पुष्टि देने वाले भगवान शिव की पूजा करते हैं। जैसे फल शाखा के बंधन से अलग हो जाता है, वैसे ही हम भी बंधन और मृत्यु से मुक्त हो जाएं और अमरता को प्राप्त करें। *वेदान्तिक अर्थ:* _वह ब्रह्म जो समय और संसार के पार है, जो त्रिनेत्रधारी (ज्ञान) शिव (परम सत्य) के रूप में प्रतीक है। शिव (आत्मा) का स्वभाव आनन्द और पूर्णता है। जो आनंद और शक्ति स्तोत्र है। अर्थात ब्रह्म ही जीवन का स्रोत है। जिस प्रकार फल बेल से सहजता से अलग हो जाता है, उसी प्रकार यह प्रार्थना है कि जीवात्मा माया, देह और कर्म के बंधनों से सहज भाव से मुक्त हो जाए। यह नश्वरता की चेतना (अविद्या) से मुक्ति की प्रार्थना है। मुझे ब्रह्मज्ञान से वंचित न करें, क्योंकि वही सच्चा अमरत्व (अमृतत्व) है।_ _वेदान्त की दृष्टि से महामृत्युंजय मंत्र आत्मबोध की प्रार्थना है। यह मृत्यु को केवल भौतिक देह की समाप्ति नहीं, बल्कि अज्ञान, आसक्ति और पुनर्जन्म के चक्र से मुक्ति के रूप में देखता है। आदि शंकराचार्य के दर्शन में, यह मंत्र आत्म-साक्षात्कार और ब्रह्म के साथ एकता प्राप्त करने की दिशा में एक उपकरण के रूप में कार्य करता है।_

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RAKESH SHARMA OM NAMH SHIVAY 🥀🚩

RAKESH SHARMA OM NAMH SHIVAY 🥀🚩

Jul 27, 2025

श्रावण माह हरियाली तीज सिंजारे पर्व पर आप और परिवार को हार्दिक मंगलमय शुभकामना मां गौरी मैया आशीर्वाद कृपा से अखंड सौभाग्यशाली एवं आयुष मति भव ॐ नमः शिवाय 🙏🙏