
Srikumar महाराज🇮🇳☸️
164 days ago
“ॐ यद्गुह्यं परमं लोके सर्वरक्षाकरं नृणाम् । यन्न कस्यचिदाख्यातं तन्मे ब्रूहि पितामह ॥१।।” (देव्याः कवचम्) यत् + गुह्यम् + परमम् + लोके सर्व-रक्षा-करम् + नृणाम् यत् + न + कस्यचित् + आख्यातम् तत् + मे + ब्रूहि + पितामह हे पितामह! यत् गुह्यम् परमम् लोके नृणाम् सर्वरक्षाकरम् अस्ति, यत् कस्यचित् न आख्यातम्, तत् मे ब्रूहि। “यत्”: सर्वनाम (Relative pronoun) नपुंसकलिंग, एकवचन अर्थ: “जो” “गुह्यम्”: गुह् (छिपाना) धातु “गुह्य” = छिपा हुआ, रहस्य निरुक्त: “गुह्यं नाम यत् न प्रकाशते” “परमम्”: “पर” + “तम” (उत्तमतर) अर्थ: सर्वोच्च, अंतिम सत्य “लोके”: सप्तमी विभक्ति अर्थ: संसार में “सर्वरक्षाकरम्”: समास: बहुव्रीहि/तत्पुरुष सर्व + रक्षा + कर अर्थ: जो सभी प्रकार की रक्षा करता है “नृणाम्”: “नृ” (मनुष्य) षष्ठी बहुवचन अर्थ: मनुष्यों का यास्क के अनुसार शब्दों का मूल अर्थ धातु से स्पष्ट होता है: गुह्य - गुह् = आवरण करना रक्षा - रक्ष् = संरक्षित करना नृ - नृ = गति, चेतना अतः: “सर्वरक्षाकरं नृणाम्” = वह तंत्र जो चेतन प्राणियों की बहु-स्तरीय रक्षा करता है यह श्लोक तीन स्तरों पर कार्य करता है: ज्ञान की खोज (Epistemology): “यन्न कस्यचिदाख्यातम्” ऐसा ज्ञान जो सामान्यतः प्रकट नहीं किया जाता सुरक्षा का सिद्धांत (Metaphysical Security): “सर्वरक्षाकरम्” केवल भौतिक नहीं, बल्कि: मानसिक आध्यात्मिक कर्मात्मक सुरक्षा ब्रूहि पितामह: - ज्ञान का संप्रेषण केवल योग्य को यह श्लोक अनुष्टुप् छन्द में है: ८ + ८ + ८ + ८ = ३२ वर्ण स्मरण में सरल मानसिक स्थिरता उत्पन्न करता है “गुह्य” का तांत्रिक अर्थ: तंत्रशास्त्र में “गुह्य” का अर्थ केवल रहस्य नहीं है: यह “आंतरिक ऊर्जा कोड” है जिसे केवल दीक्षा से समझा जा सकता है यहाँ “गुह्य” = मंत्र + न्यास + चक्र + चेतना का संयोजन मनोवैज्ञानिक एवं न्यूरोसाइंस दृष्टि से “गुह्य” = अवचेतन स्तर मानव मस्तिष्क का गहरा स्तर जहाँ भय,सुरक्षा,स्मृति स्थित होती है “सर्वरक्षाकरम्”: यह “Psychological Immunity System” है। मंत्र जप न्यूरल नेटवर्क स्थिरता इस श्लोक में “सर्वरक्षा” का संकेत नवग्रहों के दुष्प्रभाव से सुरक्षा विशेषतः राहु → भ्रम, भय शनि → बाधा देवी कवच = ग्रहों के सूक्ष्म प्रभावों के विरुद्ध ढाल बनाता है साधक आनंदमुक्त

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