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Rama Devi Sahu

8 hours ago

🌸 जिस ऋषि से समुद्र पी लेने की कथा जुड़ी है… वे राधारानी का एक केश तक नहीं उठा सके! 😳✨ महर्षि अगस्त्य ने सोचा था कि उनके तपोबल और योगशक्ति के सामने कोई शक्ति टिक नहीं सकती। लेकिन गोलोक में राधारानी ने उनकी परीक्षा के लिए न कोई पर्वत रखा, न कोई अस्त्र… उन्होंने केवल अपने सिर से एक छोटा-सा केश निकालकर भूमि पर रख दिया। और मुस्कुराकर कहा— “मुनिवर! पहले इसे उठाकर दिखाइए।” महर्षि अगस्त्य को लगा—यह भी कोई परीक्षा है? उन्होंने सहजता से केश उठाने का प्रयास किया। पर वह हिला तक नहीं। उन्होंने फिर कोशिश की… अपना बल लगाया… योगशक्ति लगाई… मंत्र और सिद्धियों का प्रयोग किया… लेकिन राधारानी का वह एक केश भूमि से तनिक भी नहीं उठा। 🌺 अब महर्षि के चेहरे का भाव बदल चुका था। जिस तपस्या पर उन्हें गर्व था, वही सामर्थ्य उस सूक्ष्म से केश के सामने निष्प्रभावी हो रहा था। वे बार-बार प्रयास करते रहे… लेकिन परिणाम वही रहा। धीरे-धीरे उनके भीतर छिपा अहंकार टूटने लगा। 🙏 महर्षि विनम्र होकर उस केश के सामने झुक गए। तभी श्रीराधारानी की कृपादृष्टि उन पर पड़ी। और जो उन्होंने देखा, उसने उनकी पूरी सोच बदल दी। 🌌 उस एक केश में उन्हें मानो अनंत सृष्टि दिखाई देने लगी। असंख्य लोक… करोड़ों सूर्य… विशाल पर्वत… नदियाँ… आकाश… और प्रकृति की विराट शक्ति। महर्षि स्तब्ध रह गए। जिसे वे एक साधारण केश समझ रहे थे, उसी में उन्हें दिव्य सत्ता की अनंतता का अनुभव होने लगा। उस क्षण महर्षि अगस्त्य को समझ आया— मनुष्य की शक्ति चाहे कितनी भी बड़ी क्यों न हो, परम शक्ति के सामने उसका अहंकार कुछ भी नहीं। वे तुरंत श्रीराधारानी के चरणों में झुक गए। 🌸 इस प्रसंग की सबसे गहरी सीख यही है— ज्ञान हो लेकिन विनम्रता न हो, तो वह अधूरा है। शक्ति हो लेकिन अहंकार हो, तो वही शक्ति पतन का कारण बन सकती है। धन, पद, सौंदर्य, बुद्धि, सिद्धि या सामर्थ्य… मनुष्य किसी भी चीज पर गर्व कर सकता है। लेकिन सृष्टि उससे कहीं अधिक विराट है। ❤️ जहाँ “मैं” समाप्त होता है, वहीं से भक्ति शुरू होती है। अगर आप भी मानते हैं कि अहंकार से बड़ी विनम्रता है, तो कमेंट में लिखें— 🌺 राधे राधे 🌺 🙏 श्रीराधारानी के चरणों में कोटि-कोटि प्रणाम।🙏

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