
Rama Devi Sahu
261 days ago
#प्रह्लादजीद्वारा_भगवन्नाम_महिमाका_वर्णन जब द्वापर समाप्त हो गया और भयानक कलियुग आ गया, तब सद्धर्म क्षीण होने लगा। अधर्म प्रबल हो गया। वैदिक धर्म एवं वर्णाश्रम-व्यवस्थाका लोप होने लगा। धर्मकी इस दुर्दशासे शौनकादि वनवासी ऋषि बड़े व्यथित हो गये। वे आपसमें मिलकर धर्मोद्धारके हेतु मन्त्रणा करने लगे। इस मन्त्रणामें गर्ग, च्यवन, गालव, देवल, धौम्य तथा उद्दालक आदि अनेक महर्षि भी सम्मिलित थे। उन्होंने अपनी सभामें यही निश्चय किया कि धर्मकी अधोगतिसे त्रस्त इस युगमें भगवान् विष्णु ही हमारे एकमात्र आश्रय हैं। अब हमलोग उन्हींकी खोज करें। महर्षि उद्दालकने सभी ऋषियोंके समक्ष यह प्रस्ताव रखा कि हमलोग शीघ्र ही ब्रह्माजीके पास चलें और उनसे पूछें कि कलियुगमें भगवान् विष्णुकी स्थिति कहाँ है। उनकी बातका अन्य ऋषियोंने सहर्ष समर्थन किया और सब ब्रह्माजीके पास पहुँचे तथा वहाँ उनका बहुविध स्तवन किया। मुनियोंके स्तवन करनेके पश्चात् ब्रह्माजीने उनकी कुशल पूछी। ऋषियोंने कहा— 'हम आपकी कृपासे सकुशल हैं। हमारे यहाँ आनेका एकमात्र कारण यह है कि हम घोर कलियुगसे त्रस्त हो रहे हैं। कृपया आप हमें यह बतलाइये कि इस समय पृथ्वीपर भगवान् विष्णु कहाँ हैं, जिनका दर्शन प्राप्तकर हम बन्धनरहित हो परम मुक्तिको प्राप्त कर सकें।' ब्रह्माजी बोले— 'तुमलोग पाताल-लोकमें जाओ और वहाँ दैत्यराज भक्त प्रह्लादजीसे पूछो। उन्हें कलियुगमें भगवान्के रहनेके स्थानका पता है।' ब्रह्माजीकी बात सुनकर तपस्वियोंने उन्हें प्रणाम किया और वे प्रह्लादजीके पास पाताललोकमें गये। उन्होंने ऋषियोंका भलीभाँति आगत-स्वागत किया। ऋषियोंने उनसे कलियुगमें भगवान् विष्णुकी स्थितिके बारेमें पूछा। श्रीप्रह्लादजीने कहा— 'पूज्य महर्षियो ! मैं आपलोगोंकी आज्ञा तथा भगवान् विष्णुके प्रसादसे भगवान्के स्थानका परिचय बतलाता हूँ — पश्चिम समुद्रके तटपर जो कुशस्थलपुरी है, जिसका निर्माण पहले राजा कुशके द्वारा हुआ था, जहाँ गोमती नदी बहती है और समुद्रसे मिली है, वही द्वारावतीपुरी कहलाती है। उसीमें षोडश कलाओं तथा बारह मूर्तियोंसे युक्त भगवान् विष्णु रहते हैं।' इसके पश्चात् प्रह्लादजीने बड़े विस्तारसे द्वारकाके माहात्म्यका वर्णन किया। अन्तमें उन्होंने कहा— नास्ति नास्ति महाभाग कलिकालसमं युगम् । स्मरणात् कीर्तनाद् विष्णोः प्राप्यते परमं पदम् ॥ कृष्णकृष्णेति कृष्णेति कलौ वक्ष्यति प्रत्यहम् । नित्ययज्ञायुतं पुण्यं तीर्थकोटिसमुद्भवम् ॥ कृष्णकृष्णेति कृष्णेति नित्यं जपति यो जनः। तस्य प्रीतिः कलौ नित्यं कृष्णस्योपरि वर्द्धते ॥ #स्कन्दपुराण_द्वा०_मा० ३८|४४-४६ "महाभाग ! कलिकालके समान दूसरा कोई युग नहीं है; इसमें भगवान्के स्मरण-कीर्तनसे मनुष्य परमपद प्राप्त कर लेता है। जो कलियुगमें नित्यप्रति 'कृष्ण, कृष्ण, कृष्ण' का उच्चारण करेगा, उसे प्रतिदिन दस हजार यज्ञों और करोड़ों तीर्थोंका पुण्य प्राप्त होगा। जो मनुष्य नित्य 'कृष्ण, कृष्ण, कृष्ण' का जप करता है, कलियुगमें श्रीकृष्णके ऊपर उसका प्रेम निरन्तर बढ़ता है।" प्रह्लादजीने कहा— कृष्णकृष्णेति कृष्णेति नित्यं जाग्रत् स्वपंश्च यः । कीर्तयेत्तु कलौ चैव कृष्णरूपी भवेद्धि सः ॥ #स्कन्दपुराण_द्वा०_मा० ३९|१ "जो कलिमें प्रतिदिन जागते और सोते समय 'कृष्ण, कृष्ण, कृष्ण' का कीर्तन करता है, वह श्रीकृष्णस्वरूप हो जाता है।" #श्री_कृष्ण_गोविन्द_हरे_मुरारे_हे_नाथ_नारायण_वासुदेव🌹______________________________________________ 🌿🍂☘️🌿🍂☘️🌿🍂☘️🌿🍂☘️🌿🍂☘️🌿

Comments (6)

Rama Devi Sahu
Dec 12, 2025
Ji Shukriya 🙏 Good Evening Jii 🌹 Bhagwan ki Aasirbad Aap pr Sadeib Bani Rahe 🙏 Aap ka Sham Suhana Ho 🙏 Radhey Radhey ❤️ Jai Shree Krishna 🙏🌹🌹

Sanjay Ahlawat
Dec 12, 2025
बहुत ही सुन्दर प्रस्तुति दी है। धन्यवाद शुभ संध्या। भगवान श्रीकृष्ण आपको खुश और स्वस्थ रखें 🙏

Rama Devi Sahu
Dec 12, 2025
Radhey Radhey ❤️ Jai Shree Krishna 🙏 Subha Sandhya Vandan ❤️🌹❤️

Rama Devi Sahu
Dec 12, 2025
Radhey Radhey ❤️ Jai Shree Krishna 🙏 Subha Sandhya Vandan ❤️🌹❤️

Riya Riya 💖💖
Dec 12, 2025
Jai shree radhe krishna ji 🌹🌹 shubh sandhya vandan behena 🤗❤️🥀

Dr Anurag Prajapati
Dec 12, 2025
जय श्री राधे कृष्णा दीदी
