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रामचरित: लंकाकाण्ड; दोहा ४०.कालरूप खल बन दहन गुनागार घनबोध | सिव बिरंचि जेहि सेवहिं तासों कवन बिरोध || अर्थात् तुलसीदासजी कहते हैं कि माल्यवंत रावण को समझाते हुए बोले कि ये श्रीरामजी कालस्वरूप , दुष्टों के समूह रूपी वन को भस्म कर देने वाले (अग्नि) , गुणों के धाम और ज्ञानघन हैं | शिवजी और ब्रह्माजी भी जिनकी सेवा में लगे रहते हैं , उनसे कैसा विरोध ? यानि उनसे विरोध करना उचित नहीं है | तात्पर्य यह है कि श्रीराम नाम के जो ब्रह्म हैं वे कालस्वरूप, दुष्टों का नाश करने वाले , गुणों का धाम और ज्ञानघन हैं और शिवजी , ब्रह्माजी जिनकी सेवा में लगे रहते हैं ; उनसे विरोध करना किसी भी प्रकार से हितकर नहीं होता | जय जय सीताराम |

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