
Rama Devi Sahu
133 days ago
जैसे मन में फूलों की वर्षा कर देती है… उसी भाव को में पिरो देता हूँ 🌸 🌺 भावों की पोशाक 🌺 बरसाने की धूल में रच-बस गया एक नाम, एक संत, एक प्रेम, एक साधना अविराम। न कोई चाह जगत की, न कोई अभिमान, बस राधा रानी का ही था उनके जीवन में स्थान। भोर की पहली किरण, यमुना का पावन जल, अश्रु से भी निर्मल, मन से भी निष्कलंक सरल। हर दिन एक ही पथ, हर दिन वही पुकार, “दर्शन बिना तेरे, जीवन मेरा बेकार…” अस्सी बरस यूँ ही बीते, जैसे क्षण कोई, न थका चरण, न रुका प्रेम, न आँख कभी रोई। पर उस दिन मन में एक लहर सी उठी, “मैंने तेरे लिए, क्या भेंट कभी सजी?” दूसरों के हाथों में चूड़ी, साड़ी, श्रृंगार, और मेरा प्रेम… बस मौन, बस विचार। “नहीं, आज कुछ लाऊँगा, तेरे लिए खास, अपने ही हाथों से बुनूँगा, प्रेम का विश्वास।” रात ने दीपक बनकर साथ निभाया, हर टाँका जैसे मंत्र बनकर समाया। धागों में भक्ति, सुई में अरमान, हर गोटा चमका जैसे चंद्रमा की मुस्कान। सुबह हुई, मन में एक उत्सव था, जैसे खुद प्रेम ही साकार वस्त्र था। सीढ़ियों पर चढ़ते, सपनों की थाली, तभी आई सामने एक चंचल सी लाली। नटखट आँखें, मुस्कान में छिपी लीला, बोली “बाबा, दिखाओ ना ये रंगीली झीला।” देखा उसने, बोली “ये मुझे दे दो”, बाबा ने कहा “ये तो मेरी राधा को…” पर प्रेम की राहें सीधी कहाँ होती हैं, कभी परीक्षा, कभी लीला, कभी रोती हैं। छीनकर भागी वो, जैसे हवा का झोंका, बाबा के हृदय में रह गया बस एक धोखा। सीढ़ियों पर बैठ, आँसू बन गए जप, “हे राधे, क्या मेरे प्रेम में था कुछ कम?” मन में प्रश्न, आँखों में पीड़ा, जैसे भक्ति ने पहन ली हो विरह की क्रीड़ा। फिर खुले पट, गूँजा मंदिर सारा, “देखो आज तो श्रृंगार है न्यारा!” बाबा ने उठाई आँखें, थम गई साँस, वही पोशाक, वही प्रेम, वही विश्वास। विस्मय में डूबे, बोले हँसकर रोते, “तू खुद ही आ गई, मेरे सपनों को ढोते?” तभी जैसे अंतर में कोई स्वर गूंजा, मृदुल, मधुर, प्रेम से पूरित पूंजा— “बाबा, वस्त्र नहीं था ये, तेरे मन का हार, तेरे प्रेम ने मुझे कर दिया लाचार। मैं कैसे रुकती, जब भाव इतने गहरे, तूने तो मुझे बाँध लिया अपने ही घेरे। मंदिर की राह क्या, मैं तो तेरे संग थी, हर टाँके में, हर धागे में, तेरे रंग थी।” बाबा की आँखें अब आँसू नहीं, आरती थीं, हर धड़कन में राधा की ही वंदना थी। समझ गए उस दिन वो प्रेम का सार, भेंट नहीं, भावना ही करती है उद्धार। बरसाना आज भी ये कथा सुनाता है, जहाँ प्रेम खुद भगवान को बुलाता है। न सोने की थाली, न हीरे का हार, सच्चे मन का भाव ही सबसे बड़ा उपहार। 🌸 जय श्री राधे राधे 🌸 यह कथा सिर्फ कहानी नहीं… ये प्रेम का वह धागा है जो सीधे हृदय से ईश्वर तक जाता है ✨💖 जब भक्ति सच्ची हो, तो भगवान भी इंतज़ार नहीं करते… वे खुद दौड़े चले आते हैं 🏃♀️🌸 एक संत का निष्कलंक प्रेम, एक छोटी सी लाली की लीला, और भावों से सजी पोशाक—यही तो है असली भक्ति का जादू ✨🪷 यह हमें याद दिलाती है कि भगवान को वस्त्र नहीं, हमारा भाव चाहिए… जहाँ प्रेम सच्चा हो, वहाँ स्वयं राधा रानी भी भक्त के पास आ जाती हैं 💫🙏 अगर दिल में सच्ची श्रद्धा है, तो हर धागा पूजा बन जाता है, हर सांस भजन बन जाती है 🎶💞 🌹🙏🌹🙏🌹🙏🌹🙏🌹🙏🌹 🌺 जय श्री लाडली जू 🌺 🌺 राधे राधे जी 🌺
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