
प्रशांत कुमार मिश्रा
112 days ago
रामचरित: लंकाकाण्ड ; दोहा ४१. जासु प्रबल माया बस सिव बिरंचि बड़ छोट | ताहि दिखावइ निसिचर निज माया मति खोट || अर्थात् तुलसीदासजी कहते हैं कि युद्ध में मेघनाद श्रीरघुनाथजी के पास जाकर अनेकों प्रकार के दुर्वचनों का प्रयोग किया , फिर उनपर अस्त्र- शस्त्र तथा सब हथियार चलाये , प्रभु ने खेल में ही सबको काटकर अलग कर दिया ; श्रीरामजी का प्रताप ( सामर्थ्य) देखकर वह मूर्ख लज्जित हो गया और अनेकों प्रकार की माया करने लगा , जैसे कोई व्यक्ति छोटा - सा साॅंप का बच्चा हाथ में लेकर गरुड़ को डरावे | शिवजी और ब्रह्माजी तक सभी बड़े-छोटे जिन प्रभु श्रीरामजी की अत्यंत बलवान माया के वश में हैं , उनको नीच बुद्धि निशाचर अपनी माया दिखा रहा है | तात्पर्य यह है कि हमें प्रभु श्रीरामजी के अतुलनीय प्रताप यानि सामर्थ्य और उनकी माया के प्रभाव को सदा अनुभव करना चाहिए जिसके वश में शिवजी और ब्रह्माजी तक सभी बड़े - छोटे हैं | जय जय सीताराम |
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