
Rama Devi Sahu
282 days ago
बाँके बिहारी जी और दासी का प्रेम बहुत समय पहले वृंदावन में एक साधारण दासी रहती थी। वह किसी बड़े घर में सेवा करती थी, लेकिन उसका मन सदा ठाकुर बाँके बिहारी में रमता था। हर सुबह काम पर जाने से पहले वह मंदिर आती और बस ठाकुर जी को निहारती रहती। उसके पास चढ़ाने के लिए न फूल थे, न मिष्ठान्न; केवल एक छोटा-सा जल का लोटा वह रोज़ अर्पित करती। मंदिर के कुछ लोग उस पर हँसते और कहते— “क्या ठाकुर जी केवल जल से प्रसन्न होंगे? इतने सारे धनवान भक्त यहाँ रत्नजटित थाल लेकर आते हैं, और तू केवल एक लोटा जल चढ़ाती है!” दासी चुपचाप मुस्कुराती और कहती— “मेरे पास बस यही है, पर इसे मैं पूरे प्रेम से अर्पित करती हूँ।” एक दिन रात में पुजारी को स्वप्न आया। स्वप्न में बाँके बिहारी जी स्वयं प्रकट हुए और बोले— “आज मेरी प्यास बुझी है उस दासी के लोटे से। उसके प्रेम के जल से मुझे जो तृप्ति मिली, वह किसी रत्नजटित थाल से नहीं मिली।” अगले दिन पुजारी ने सभी को यह बात सुनाई। लोग चकित रह गए और उन्होंने जाना कि भगवान को चढ़ावे की भव्यता नहीं, बल्कि हृदय की सच्चाई प्रिय होती है। इसीलिए कहते हैं — “बिहारी जी भक्त के भाव के भूखे हैं, वस्त्र–भूषण के नहीं।”

Comments (2)

Rama Devi Sahu
Nov 21, 2025
Jai Shree Krishna 🙏🌹🌹

