
Rama Devi Sahu
136 days ago
एक समय की बात है… यह प्रसाद तुम इस तरह देना कि मुझे पता ना चले… एक तरफ पति की आज्ञा… दूसरी तरफ अपना वचन… और तीसरी तरफ पूरे ब्रह्मांड का संतुलन… यही वह क्षण था जब भक्ति, प्रेम और धर्म—तीनों की परीक्षा होने वाली थी। एक बार वैकुंठ लोक में नारद मुनि, माता मां लक्ष्मी के महल में पहुंचे। उन्होंने प्रेमपूर्वक उनकी स्तुति की— “नारायण नारायण… हरि हरे… लक्ष्मी नारायण…” उनकी भक्ति से प्रसन्न होकर लक्ष्मी जी मुस्कुराईं और बोलीं— “हे नारद, मांगो क्या वर चाहिए?” नारद जी ने विनम्रता से कहा— “माता, पहले वचन दीजिए कि आप मेरी बात टालेंगी नहीं…” लक्ष्मी जी ने सहज भाव से वचन दे दिया। तभी नारद बोले— “माता, मुझे भगवान भगवान विष्णु के चरणों का स्पर्श किया हुआ महाप्रसाद चाहिए…” यह सुनते ही लक्ष्मी जी के चेहरे की मुस्कान हल्की पड़ गई। वे चिंतित हो उठीं— “भक्त, तुम कुछ और मांग लो… सोना, चांदी, रत्न… लेकिन यह प्रसाद मैं नहीं दे सकती…” पर नारद मुनि कहाँ मानने वाले थे— “माता, आपने वचन दिया है… मुझे वही चाहिए…” अब लक्ष्मी जी गहरे धर्मसंकट में पड़ गईं— एक ओर पति की आज्ञा… दूसरी ओर अपना दिया हुआ वचन… कुछ देर सोचने के बाद उन्होंने भोग की थाली सजाई और भगवान विष्णु के पास गईं। प्रेम से सेवा की, भोग अर्पित किया… लेकिन उनके चेहरे की उदासी छुप ना सकी। भगवान विष्णु ने पूछा— “प्रिय, तुम उदास क्यों हो?” तब लक्ष्मी जी ने सारी बात बता दी। भगवान मंद-मंद मुस्कुराए और बोले— “ठीक है प्रिय… आज के लिए मैं अपना आदेश वापस लेता हूँ… तुम वह महाप्रसाद नारद को दे सकती हो… लेकिन ध्यान रखना… यह प्रसाद इस तरह देना कि मुझे पता ना चले…” लक्ष्मी जी की खुशी का ठिकाना ना रहा। उन्होंने तुरंत भगवान के चरणों से स्पर्श किया हुआ महाप्रसाद नारद मुनि को दे दिया। महाप्रसाद पाते ही नारद मुनि का रोम-रोम पुलकित हो उठा… उनकी आंखों में आनंद के आँसू आ गए… “नारायण… नारायण…!” वे झूमने लगे… नाचने लगे… एक लोक से दूसरे लोक में विचरण करने लगे। ऐसे ही कीर्तन करते-करते वे कैलाश पर्वत पहुंचे, जहां भगवान शिव विराजमान थे। शिव जी ने उन्हें इस दिव्य आनंद में देखा तो आश्चर्यचकित रह गए— “हे नारद, आज तुम इतने आनंदित क्यों हो?” नारद मुनि ने पूरी कथा सुना दी। यह सुनकर शिव जी ने हाथ जोड़कर कहा— “नारद, तुम बहुत भाग्यशाली हो… क्या मेरे लिए भी थोड़ा सा प्रसाद लाए हो?” यह सुनकर नारद जी थोड़े संकोच में पड़ गए… उन्हें याद आया कि वे कुछ भी साथ नहीं लाए… तभी उनकी नजर अपनी उंगली पर पड़ी… वहां महाप्रसाद का एक छोटा सा कण लगा हुआ था! वे प्रसन्न होकर बोले— “हाँ प्रभु! यह देखिए… यह छोटा सा कण… सिर्फ आपके लिए…” शिव जी ने उस कण को बड़े आदर से ग्रहण किया… जैसे ही वह कण उनके मुख में गया… उसी क्षण उनके भीतर भक्ति की प्रचंड लहरें उठने लगीं… वे भाव-विभोर होकर तांडव नृत्य करने लगे! पूरे ब्रह्मांड में कंपन होने लगा… देवता भयभीत हो गए— “यदि शिव जी नहीं रुके… तो सृष्टि का संतुलन बिगड़ जाएगा!” सबने मिलकर माता पार्वती से प्रार्थना की। माता पार्वती तुरंत शिव जी के पास पहुंचीं और प्रेम से बोलीं— “प्रभु… शांत हो जाइए…” कुछ समय बाद जब शिव जी शांत हुए, तो उन्होंने पूरी बात बताई। यह सुनकर पार्वती जी के मन में भी इच्छा जगी— “क्या आपने मेरे लिए भी थोड़ा सा प्रसाद बचाया है?” शिव जी मौन हो गए… यह देख पार्वती जी थोड़ी उदास हो गईं… तभी सभी देवता ब्रह्मा जी के साथ वैकुंठ पहुंचे और भगवान विष्णु से निवेदन किया। भगवान विष्णु तुरंत कैलाश पहुंचे और पार्वती जी से बोले— “हे देवी, आपकी इच्छा अवश्य पूरी होगी… लेकिन शांत हो जाइए…” पार्वती जी बोलीं— “प्रभु, यदि यह प्रसाद केवल मुझे ही मिलेगा… तो मेरा मन शांत नहीं होगा… आप ऐसा कीजिए कि यह महाप्रसाद सभी जीवों को मिले…” भगवान श्री हरि मुस्कुराए— “तथास्तु!” “मैं नीलांचल धाम में प्रकट होऊंगा… मेरा महाप्रसाद पूरे जगत में प्रसिद्ध होगा… और सबसे पहले वह आपको अर्पित किया जाएगा…” इसी संकल्प के साथ भगवान ने जगन्नाथ पुरी में भगवान जगन्नाथ के रूप में अवतार लिया। वहीं माता पार्वती विमला देवी के रूप में विराजमान हुईं। आज भी वहां भगवान जगन्नाथ को लगाया गया भोग पहले विमला देवी को अर्पित किया जाता है… और उसके बाद ही वह महाप्रसाद सभी भक्तों में बांटा जाता है। यही है उस दिव्य महाप्रसाद की कथा… जहां एक छोटा सा कण भी पूरे ब्रह्मांड को भक्ति में डुबो सकता है… 🙏 जय जगन्नाथ 🙏
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