
Rama Devi Sahu
187 days ago
अठारह दिनों के उस महाविनाश ने हस्तिनापुर की साँसों में केवल धुआँ, शोक और सन्नाटा भर दिया था। कभी प्रतिशोध की अग्नि से दहकने वाली द्रौपदी आज ऐसी थक चुकी थी मानो अस्सी वर्ष की कोई जर्जर वृद्धा हो—थकी हुई देह से नहीं, बल्कि भीतर तक घायल आत्मा और चेतना से। महल की खिड़की से बाहर झाँकती तो बस विधवाओं का विलाप सुनाई देता। गलियों में पुरुष लगभग न के बराबर थे और अनाथ बच्चे मलबे के बीच अपना कल खोज रहे थे। महारानी द्रौपदी अपने कक्ष में निस्पंद बैठी शून्य को ताक रही थी, तभी द्वार पर एक परिचित आहट गूँजी। श्रीकृष्ण भीतर आए। उन्हें देखते ही द्रौपदी का संयम टूट गया। वह दौड़कर उनसे लिपट गई और फूट-फूटकर रोने लगी। कृष्ण शांत रहे। उन्होंने कुछ नहीं कहा, बस स्नेह से उसके सिर पर हाथ फेरते रहे—जैसे उसके भीतर जमी पीड़ा की बर्फ को धीरे-धीरे पिघलने का समय दे रहे हों। थोड़ी देर बाद उन्होंने उसे अलग कर पलंग पर बैठाया। द्रौपदी (भरे गले से): “सखा, यह क्या हो गया? क्या इसी रक्तरंजित अंत के लिए हमने सब कुछ सहा था? मैंने तो ऐसा भयावह परिणाम कभी नहीं सोचा था…” कृष्ण (गंभीर स्वर में): “नियति बड़ी कठोर होती है, पांचाली। वह हमारी इच्छाओं से नहीं, हमारे कर्मों से भविष्य का वस्त्र बुनती है। तुम प्रतिशोध चाहती थीं—देखो, वह पूर्ण हुआ। केवल दुर्योधन-दुःशासन ही नहीं, पूरा कौरव वंश मिट गया। आज तो तुम्हें विजयी होना चाहिए।” द्रौपदी (वेदना से): “सखा, क्या तुम मेरे घावों पर मरहम लगाने आए हो या उन्हें और कुरेदने?” कृष्ण: “मैं तुम्हें दोष देने नहीं, सत्य से मिलवाने आया हूँ। जब हम कर्म करते हैं, तब उनके दूरगामी परिणाम हमें दिखाई नहीं देते। और जब वही परिणाम काल बनकर सामने आते हैं, तब उन्हें रोकने का कोई उपाय नहीं बचता।” द्रौपदी (काँपती आवाज़ में): “तो क्या इस महाविनाश की जिम्मेदार केवल मैं हूँ, कृष्ण? क्या मैं ही इस सर्वनाश की जननी हूँ?” कृष्ण: “नहीं द्रौपदी, स्वयं को इतना भी केंद्र मत मानो। इतिहास अनेक कारणों से बनता है। पर यह भी सत्य है—यदि तुम्हारे कुछ निर्णयों में थोड़ी दूरदर्शिता होती, तो आज तुम्हारा हृदय इस अग्नि में न जल रहा होता।” द्रौपदी: “पर मैं क्या कर सकती थी, सखा? मैं तो परिस्थितियों की कठपुतली थी।” कृष्ण (धीमे किंतु स्पष्ट स्वर में): “तुम बहुत कुछ कर सकती थीं, पांचाली… ज़रा पीछे देखो— • स्वयंवर में यदि तुम कर्ण का अपमान न करतीं और उसे अवसर देतीं, तो संभव था कि वही वीर पांडवों का सहायक बनता, दुर्योधन का नहीं। • जब कुंती ने तुम्हें पाँच पतियों की पत्नी बनने को कहा, यदि तुम अपने अधिकार के लिए खड़ी होतीं, तो शायद समाज की दिशा ही कुछ और होती। • और सबसे बड़ा आघात… जब तुमने दुर्योधन का उपहास करते हुए कहा—‘अंधे का पुत्र अंधा’—वह केवल शब्द नहीं थे, अहंकार को बींध देने वाला तीर थे। यदि वे शब्द न निकले होते, तो चीरहरण की वह विभीषिका शायद कभी जन्म ही न लेती।” कृष्ण क्षण भर रुके। उनकी आँखों में चेतावनी की गहराई थी। “द्रौपदी, हमारे शब्द भी कर्म ही होते हैं। हाथ से छूटा पत्थर और मुख से निकला वचन कभी लौटकर नहीं आता। शब्दों की चोट केवल व्यक्ति को नहीं, पूरे युग को झुलसा सकती है।” फिर उन्होंने उसकी आँखों में देखते हुए कहा— “इस सृष्टि में मनुष्य ही ऐसा प्राणी है जिसका विष दाँतों में नहीं, उसके शब्दों में छिपा होता है। इसलिए बोलने से पहले हर वचन को मौन की तराजू पर तौलना आवश्यक है।” द्रौपदी मौन रह गई। उसे समझ आ चुका था—कुरुक्षेत्र की उस महाचिता में केवल अस्त्र-शस्त्र ही नहीं, उसके शब्द भी घी बनकर गिरे थे। सीख: हमारे बोले हुए शब्द ही हमारे कर्मों का बीज होते हैं। सोच-समझकर बोलना ही जीवन की सबसे बड़ी साधना है।

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