
Rama Devi Sahu
162 days ago
“श्याम सुंदर का गायिका वेश” एक दिन श्रीराधा अत्याधिक मानवती हो गईं। श्रीकृष्ण साम, दान, भेद आदि उपायों से उन्हें प्रसन्न नही कर पाए। तब वे कुन्दलताजी से मन्त्रणा किये। इसके बाद वे वस्त्र, भूषणादि परिधानों से नारिवेश में सुसज्जित होकर कोयल सी मधुर वाणी में कुन्दलताजी से वार्तालाप करते हुए श्रीराधारानी से मिलने चल पड़े। दूर से ही कुन्दलताजी के साथ एक अपूर्व सुन्दरी स्त्री को आते देख श्रीराधा सह सभी सखियाँ भी कौतुकी हो उठीं। श्रीराधा बोलीं–‘अहो ! कुन्दलते इस समय किस लिए आना हुआ। तुम्हारे साथ यह सुन्दर स्त्री कौन है ?’ कुन्दलता जी बोलीं–‘राधे ! यह मेरी सखी है। तुम्हारे नाम, गुण, कीर्ति का श्रवण कर मथुरा से तुमसे मिलने आई है। यह संगीत विद्या में वृहस्पति को परास्त करने वाली है। तुम एकबार स्वयं सुनकर निर्णय करो।’ श्रीराधा ने नारी वेषधारी श्रीकृष्ण से पूछा–‘अच्छा सखी, तुमने संगीत किससे सीखा ? क्या तुम सभी राग सभी स्वरों में गा सकती हो ?’ श्रीकृष्ण ने उत्तर दिया–‘मैने संगीत शास्त्र स्वयं वृहस्पति जी से सीखा है। आप जो कहें, मैं गा सकती हूँ।’ श्रीराधा बोलीं–‘बहुत अच्छा, बिना वीणा की सहायता के शुद्धा श्रुति का गान करना सम्भव नहीं, अतएव तुम वीणा की सहायता से राग, ताल, गमक, स्वर, जाति, तान, ग्राम इत्यादि के साथ एक मधुर गान सुनाओ।’ श्रीराधा की अनुमति पाकर गायिका वेश में श्रीकृष्ण अपूर्व कण्ठस्वर में गायन करने लगे। इस मधुर गायन रीति के श्रवण से साखियों के नयनों से अश्रु बहने लगे। मानवती श्रीराधा का मानयुक्त-चित्त रूपी अति कठोर हीरा भी द्रवीभूत हो गया, अर्थात श्रीराधा का मान जाता रहा। श्रीराधा अत्यन्त प्रसन्न हो बोली–‘सखी तुम्हारा गायन सुधा का तिरस्कार करता है। मैं तुम्हें कुछ पुरस्कार देना चाहती हूँ। कहो तुम्हें क्या चाहिए ?’ कुन्दलताजी बोली–‘राधे ! तुम अपना बहुमूल्य हार इसे उपहार दो और आलिंगन रूप उपहार दे दो।’ श्रीराधा ने प्रसन्न हो अपना हार उतारकर श्याम सुन्दर के गले मे डाल दिया और उनका आलिंगन कर लिया। आलिंगन करते ही प्रियाजी प्रियतम को पहचान गईं। उन्होंने कुन्दलता जी की ओर मुस्कुराकर कटाक्षपात किया और फिर हँसकर श्याम सुन्दर से कहा–‘बहुत हुआ छलिया। मैंने आपको पहचान लिया।’ यह कहकर उन्होंने उन्हें पुनः श्याम सुंदर का आलिंगन कर लिया। सभी सखियाँ यह देख आनन्द से भर गई। ० ० ०

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