
Rama Devi Sahu
55 days ago
अयोध्या की सुप्रसिद्ध 'मणिरामदास की छावनी' का इतिहास बड़ा ही दिव्य है। स्वामी मणिरामदास जी महाराज एक उच्च कोटि के तपस्वी थे। उनके जीवन की यह कथा सिद्ध करती है कि भक्त के प्रेम के आगे भगवान को भी झुकना पड़ता है। महाराज जी ने चित्रकूट के घने जंगलों में लगातार 12 वर्षों तक हनुमान जी की कठोर साधना की। उनकी भक्ति से प्रसन्न होकर पवनपुत्र हनुमान जी प्रत्यक्ष प्रकट हुए। हनुमान जी ने उन्हें एक दिव्य मणि भेंट करनी चाही, जो संसार के समस्त ऐश्वर्य दे सकती थी। किंतु महाराज जी ने बड़ी विनम्रता से उसे अस्वीकार कर दिया और कहा: "प्रभु, मुझे इस पत्थर की मणि की आवश्यकता नहीं है। यदि आप देना ही चाहते हैं, तो स्वयं मेरे साथ चलिए। आपके साथ होने पर मुझे त्रिलोकी के किसी वैभव की लालसा नहीं रहेगी।" भक्त की निस्वार्थ भावना देख हनुमान जी ने वचन दिया कि वे उनके साथ चलेंगे, किंतु एक विग्रह (मूर्ति) स्वरूप में। उन्होंने कहा कि "मैं कुछ समय पश्चात अयोध्या में एक निश्चित स्थान पर प्रकट होऊंगा और तुम्हारी सेवा स्वीकार करूँगा।" इसके बाद महाराज जी अयोध्या आ गए और सरयू तट के पास एक कुटिया बनाकर रहने लगे। वही स्थान आज 'मणिरामदास की छावनी' के रूप में विख्यात है। कुछ समय बीतने के बाद, एक सेठ अपनी बैलगाड़ी में हनुमान जी की एक विशाल पाषाण प्रतिमा लेकर कहीं जा रहे थे। जैसे ही बैलगाड़ी महाराज जी की कुटिया (छावनी) के सामने पहुँची, अचानक गाड़ी के पहिए की धुरी टूट गई। हनुमान जी का विग्रह सरयू की रेत में गिर गया। सेठ ने गाड़ी ठीक करवाई और कई लोगों की मदद से प्रतिमा को वापस उठाने का प्रयास किया, लेकिन वह विग्रह टस से मस न हुआ। परेशान होकर सेठ ने महाराज जी से कहा: "बाबा! आपने ऐसा क्या जादू कर दिया कि यह मूर्ति अब हिल भी नहीं रही है?" महाराज जी को तुरंत चित्रकूट में हनुमान जी द्वारा दिया गया वचन याद आ गया। वे समझ गए कि प्रभु अपने वादे के अनुसार छावनी में निवास करने आ गए हैं। महाराज जी ने भावविभोर होकर हनुमान जी से प्रार्थना की— "प्रभु! अब अपना भार हल्का करें और भक्तों पर कृपा करें।" प्रार्थना करते ही, जो विग्रह कई पुरुषों से नहीं उठ रहा था, वह अत्यंत हल्का हो गया और उसे ससम्मान छावनी में स्थापित किया गया। महाराज जी और हनुमान जी का संबंध अटूट था। स्वामी जी प्रतिदिन हनुमान जी को श्रीमद् वाल्मीकि रामायण का पाठ सुनाते थे। कहा जाता है कि हनुमान जी साक्षात उपस्थित होकर कथा श्रवण करते थे। यह परंपरा आज भी 'मणिरामदास की छावनी' में जीवित है। वहां आज भी प्रतिदिन हनुमान जी के विग्रह के सम्मुख वाल्मीकि रामायण का पाठ किया जाता है। यह स्थान अयोध्या के प्रमुख संत निवासों और सेवा केंद्रों में से एक माना जाता है। जय श्री राम! जय हनुमान!
Comments (2)

Rama Devi Sahu
Jul 17, 2026
Bhagwan ki Aasirbad se Aap ka Pure Parivar Hamesha Khush Rahe or Swasth Surakshit Rahe 🌹 Shubh Sandhya Vandan ke Sath Ram Ram Ji 🌹🌹

RAKESH SHARMA OM NAMH SHIVAY 🥀🚩
Jul 7, 2026
प्रभु श्री राम जय हनुमान जी का असीम स्नेह अपार आशीर्वाद कृपा सदेव आप और परिवार पर बना रहे उज्जवल भविष्य KI शुभ कामनाएं करते हैं जी 💐💐💐🙏🙏🙏
