
Rama Devi Sahu
185 days ago
रंगभरी एकादशी (जिसे आमलकी एकादशी भी कहा जाता है) हिंदू धर्म में विशेष महत्व रखती है। यह एकमात्र ऐसी एकादशी है जिसका संबंध भगवान विष्णु के साथ-साथ भगवान शिव और माता पार्वती से भी है। यहाँ रंगभरी एकादशी की संपूर्ण व्रत कथा दी गई है: रंगभरी (आमलकी) एकादशी व्रत कथा प्राचीन काल में वैदिश नामक एक नगर था, जहाँ ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र चारों वर्ण के लोग आनंदपूर्वक रहते थे। उस नगर के राजा चित्ररथ थे, जो बहुत विद्वान और धार्मिक थे। उस नगर में कोई भी दरिद्र या कंजूस नहीं था। सभी नगरवासी विष्णु भक्त थे और प्रत्येक एकादशी का व्रत पूरी श्रद्धा से किया करते थे। एक बार फाल्गुन माह के शुक्ल पक्ष की आमलकी (रंगभरी) एकादशी आई। राजा और प्रजा सभी ने मंदिर जाकर आंवले के वृक्ष की पूजा की और रात्रि जागरण किया। व्याध (शिकारी) की कथा उसी समय एक प्यासा और भूखा व्याध (शिकारी) मंदिर में आया। वह अपने परिवार का पेट पालने के लिए जीव-हत्या करता था। भूख-प्यास से व्याकुल होकर वह मंदिर के एक कोने में बैठ गया और विष्णु जी की कथा तथा एकादशी का माहात्म्य सुनने लगा। उसने पूरी रात जागकर अन्य भक्तों के साथ जागरण किया। अगले दिन सुबह होने पर व्याध अपने घर गया और भोजन किया। कुछ समय बाद उस व्याध की मृत्यु हो गई। व्याध का अगला जन्म अनजाने में किए गए आमलकी एकादशी व्रत के प्रभाव से उस व्याध का अगला जन्म एक महान राजा के रूप में हुआ। उसका नाम वसुरथ रखा गया। वह अत्यंत बलवान, धार्मिक और सत्यवादी राजा बना। एक बार राजा वसुरथ शिकार खेलते समय जंगल में रास्ता भटक गया और एक वृक्ष के नीचे सो गया। तभी वहां कुछ डाकू आए और राजा को अकेला पाकर मारने दौड़े। उन्होंने राजा पर अस्त्र-शस्त्रों से प्रहार किया, लेकिन वे शस्त्र राजा को छूते ही फूलों की वर्षा में बदल गए। तभी राजा के शरीर से एक दिव्य देवी प्रकट हुईं और उन्होंने उन सभी दुष्ट डाकुओं का वध कर दिया। जब राजा की नींद खुली, तो उन्होंने डाकुओं को मरा हुआ पाया। तब आकाशवाणी हुई: "हे राजन! यह सब तुम्हारे पूर्व जन्म में किए गए आमलकी एकादशी व्रत का फल है। उस व्रत के प्रभाव से भगवान विष्णु स्वयं तुम्हारी रक्षा कर रहे हैं।" यह सुनकर राजा बहुत प्रसन्न हुआ और वह वापस अपने राज्य लौटकर और भी श्रद्धा के साथ एकादशी का पालन करने लगा। व्रत का महत्व भगवान शिव का संबंध: काशी की परंपरा के अनुसार, इस दिन भगवान शिव माता पार्वती का गौना कराकर पहली बार काशी आए थे, इसलिए इसे 'रंगभरी' एकादशी कहते हैं और गुलाल से बाबा विश्वनाथ की पूजा की जाती है। *आंवले का महत्व: इस दिन आंवले के वृक्ष की पूजा होती है क्योंकि माना जाता है कि भगवान विष्णु ने इसे आदि वृक्ष के रूप में प्रतिष्ठित किया था। पूजा विधि के मुख्य बिंदु *सुबह स्नान कर भगवान विष्णु या शिव जी के सम्मुख व्रत का संकल्प लें। * आंवले के वृक्ष की धूप, दीप और नैवेद्य से पूजा करें। * यदि आंवले का वृक्ष न हो, तो आंवले का फल भगवान को अर्पित करें। * रंगभरी एकादशी है, इसलिए भगवान शिव को अबीर-गुलाल अर्पित करना अत्यंत शुभ माना जाता है।

Comments (2)

Rama Devi Sahu
Feb 26, 2026
🙏‼️ Om Namo Bhagavate Vasudevaya Namah ‼️🙏 Subha Dopahar Jii 🙏 Bhagwan Shri Hari Vishnu ebm Mata Lakshmi Ji ki Kripa Drishti Aap or Aap ke Pure Parivar pr Hamesha Banaye Rakhe 🙏 Aap ka Har Pal Subha Mangalmay Ho 🙏🌹🌹

R k jangid phulera Jaipur
Feb 26, 2026
जय श्री हरि विष्णु की 🙏
